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________________ रघुवरजसप्रकास [ २१५ अथ गीत लैहचाळ उदाहरण गीत निरधार निवाजण भै अघ भांजण , सेवग तार सधीर सौ जी । दुख देवां दहण दैत दपट्टण , बीर निको रघुबीर सौ जी ॥ म्रगनैण सिया मन रूप सुरंजन , कौटिक काम सकाम सौ जी । दनियां बरदायक सेव सिहायक , रैण किसौ नूप राम सौ जी ॥ निज कोसळ नंदण देवत बंदण , धारण पांण धनंखरौ जी । सझ कुंभ सकारण रांवण मारण , लेण भुजां बळ लंकरौ जी ॥ जन सोच बिभजण प्राचत पंजण , दांन अभैवर देणरौ जी । 'किसना' निसचैं कर राच सियाबर , जाण भरोसौ जेणरौ जी ॥ ६२ १२. निरधार-जिसका कोई सहारा या आश्रय न हो। निवाजण-प्रसन्न होने वाला। भै भय । घ-पाप । भांजण-नष्ट करने वाला। सधीर-धैर्यवान । दहण-नाश करने वाला । दैत-दैत्य । दपट्टण-ध्वंश करने वाला। सेव-सेवा, सेवक । सिहायक-सहायक । रैण-भूमि । किसौ-कौनसा। नंदण-पुत्र । वंदण-वंदनीय । पांण (पाणि)-हाथ । कंभ-रावणका भाई कुंभकर्ण । विभंजण-मिटाने वाला। प्राचत-पाप। पंजण-नष्ट करने वाला, मिटाने वाला । निसच-निश्चय । राच-लीन हो जा। सियाबर-श्री रामचन्द्र । भरोसौ-विश्वास । जेण-जिसका। . Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003420
Book TitleRaghuvarjasa Prakasa
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSitaram Lalas
PublisherRajasthan Prachyavidya Pratishthan Jodhpur
Publication Year1960
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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