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________________ NY चेतोदूत । " मेघविजयोपाध्याय की तरह एक अन्य विद्वान् ने भी मेघदूत ही के अंतिमपाद की समस्यापूर्ति कर अपना विज्ञप्तिलेख भेजा है । इस में उस ने अपने चेतः (चित्त ) ही को दूत कल्पा है और उसी के द्वारा अपना संदेश, गुरुसेवा में पहुंचाना चाहा है। इस का रचना-प्रकार ऊपयुक्त दूतों से भिन्न प्रकार का है । इस में गुरु और स्थानादि के विशेष नामों का स्पष्ट उल्लेख न कर सामान्य रूप से ही वर्णन किया है, कि जिस से सदैव और सब कोई इस का व्यवहार कर सके । बडी अच्छी मधुर और प्रासादिक रचना है। उदाहरण के लिये इस के भी कुछ पद्य उद्धृत किये जाते हैं। ते जीयासुर्जगति गुरवः प्रौढपुण्यप्रभावा __ भास्वद्रूपे प्रतपति भृशं यत्प्रतापे प्रतप्ताः । दीना वादीश्वरसमुदयाः कुर्वते तापशान्त्यै स्निग्धच्छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु ।। १ ॥ संयोगार्थी गुरुपदभुवो वल्लभायाः प्रसत्तेः शिष्यः कश्चित् समदमिह दुर्वारणं स्वैरचारम् । चिन्तायोगात् सुचिरमचलस्वात्मनिष्ठं मनः स्वं वप्रक्रीडापरिणतगजं प्रेक्षणीयं ददर्श ॥ २ ॥ निश्शेषार्थप्रथननिपुणं चित्तमेतत्तदस्मात् स्वाभीष्टं मे नियतमचिरात् सिद्धमेवेति मत्वा । दत्तार्घाय प्रमदजनितैर्बाष्पपूरैः स तस्मै प्रीतः प्रीतिप्रमुखवचनं स्वागतं व्याजहार ॥ ४ ॥ १ · मेघदूतसमस्यालेख ' और ' चेतोदूत ' दोनों प्रबंध इसी ग्रन्थरत्नमाला के २४ और २५ वे रत्नांक में, थोडे समय पहले, प्रकट हो चुके हैं। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003389
Book TitleVignaptitriveni
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinvijay
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1916
Total Pages180
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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