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________________ पाणिनीय-अष्टाध्यायी- प्रवचनम् अन्वयः - तेन प्रातिपदिकात् कृते यथाविहितं प्रत्ययः संज्ञायाम् । अर्थ:-तेन इति तृतीयासमर्थात् प्रातिपदिकात् कृत इत्यस्मिन्नर्थे यथाविहितं प्रत्ययो भवति, संज्ञायां गम्यमानायाम् । उदा०-मक्षिकाभिः कृतम्-माक्षिकम् । सारघम् । पौत्तिकम् । मधुनः संज्ञा एता: । ४१२ आर्यभाषाः अर्थ- (तेन) तृतीया - समर्थ प्रातिपदिक से (कृते) बनाया गया अर्थ में यथाविहित प्रत्यय होता है, (संज्ञायाम् ) यदि वहां संज्ञा अर्थ की प्रतीति हो । उदा० - मक्षिकाओं के द्वारा बनाया गया- माक्षिक (मधु) । सरघाओं के द्वारा बनाया गया- सारघ (मधु) । पुत्तिकाओं के द्वारा बनाया गया-पौत्तिक (मधु) । सरघा और पुत्तिका नामक विशेष कार की मक्खियां हैं जो मधु बनाती हैं। सिद्धि-माक्षिकम्। मक्षिका+भिस्+अण् । माक्षिक् +अ । माक्षिक+सु । माक्षिकम् । यहां तृतीया - समर्थ 'मक्षिका' शब्द से कृत अर्थ में तथा संज्ञा अर्थ की गम्यमानता में इस सूत्र से यथाविहित प्रत्यय का विधान किया गया है। पूर्ववत् अंग को आदिवृद्धि और अंग के आकार का लोप होता है। " विशेषः महाभाष्य के पाठ से विदित होता है कि 'संज्ञायां कुलालादिभ्यो वुञ् एक सूत्र है। वहां 'माक्षिकम् ' आदि पदों की सिद्धि के लिये योग-विभाग का विधान किया है। अतः यहां योगविभाग पूर्वक सूत्र का प्रवचन किया गया है। वुञ् - (३) (ख) कुलालादिभ्यो वुञ् । ११८ । प०वि० - कुलाल- आदिभ्यः ५ । ३ वुञ् १ । १ । स०-कुलाल आदिर्येषां ते कुलालादयः, तेभ्यः - कुलालादिभ्यः ( बहुव्रीहि: ) । अनु०-तेन, कृते, संज्ञायामिति चानुवर्तते । अन्वयः-तेन कुलालादिभ्यः कृते कुन् संज्ञायाम्। अर्थ:- तेन इति तृतीयासमर्थेभ्य: कुलालादिभ्यः प्रातिपदिकेभ्यः कृत इत्यस्मिन्नर्थे वुञ् प्रत्ययो भवति, संज्ञायां गम्यमानायाम्। उदा०-कुलालेन कृतम्-कौलालकम् । वरुडेन कृतम्-वारुडकम्, इत्यादिकम्। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003298
Book TitlePaniniya Ashtadhyayi Pravachanam Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanacharya
PublisherBramharshi Swami Virjanand Arsh Dharmarth Nyas Zajjar
Publication Year1998
Total Pages624
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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