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________________ ४०३ तृतीयाध्यायस्य तृतीयः पादः (६) गच्छन्तमेव मां विद्धि । यहां गच्छन्तम्' पद में इस सूत्र से भविष्यत्काल में लट: शतृशानचा०' (३।२।१२४) से लट्' प्रत्यय के स्थान में 'शतृ' आदेश है। (७) एष गमिष्यामि । यहां 'गमिष्यामि' पद में विकल्प पक्ष में लृट् शेषे च' (३ ।३ ।१३) से भविष्यत्काल में लुट्' प्रत्यय है। (८) गन्ताऽस्मि । यहां गन्ता' पद में विकल्प पक्ष में 'अनद्यतने लुट्' (३ ।३।१५) से भविष्यत्काल में लुट्' प्रत्यय है। भूतवद्वर्तमानवच्च प्रत्ययविधिः (भविष्यति) (२०) आशंसायां भूतवच्च ।१३२। प०वि०-आशंसायाम् ७।१ भूतवत् अव्ययपदम्, च अव्ययपदम्। भूते इव भूतवत् तत्र तस्येव' (५ ।१।११५) इति वति: प्रत्ययः । अप्राप्तस्य प्रियपदार्थस्य प्राप्तुमिच्छा=आशंसा, तस्याश्च भविष्यत्कालो विषयः । अनु०-वर्तमानवद् वा इति चानुवर्तते। अन्वय:-(भविष्यति) आशंसायां धातोर्वा भूतवद् वर्तमानवच्च प्रत्ययाः। अर्थ:-भविष्यति काले आशंसायामर्थे वर्तमानाद् धातो: परो विकल्पेन भूतवद् वर्तमानवच्च प्रत्यया भवन्ति। उदा०-उपाध्यायश्चेद् आगमत्, आगत:, आगच्छति, आगमिष्यति वा, एते वयं व्याकरणमध्यगीष्महि, अधीतवन्त:, अधीमहे, अध्येष्यामहे । आर्यभाषा-अर्थ-भविष्यत्काल में (आशंसायाम्) अप्राप्त प्रिय पदार्थ की प्राप्ति की इच्छा अर्थ में विद्यमान (धातोः) धातु से परे (वा) विकल्प से (भूतवत्) भूतकाल के समान (च) और (वर्तमानवत्) वर्तमानकाल के समान प्रत्यय होते हैं। उदा०-उपाध्यायश्चेद् आगमत, आगतः, आगच्छति, आगमिष्यति वा, एते वयं व्याकरणमध्यगीष्महि, अधीवन्त:, अधीमहे, अध्येष्यामहे । यदि उपाध्याय जी आ गये तो ये हम लोग व्याकरण पढ़ेंगे। सिद्धि-(१) आगमत् । इस पद से इस सूत्र से भविष्यत्काल में 'लुङ् (३।२।११०) से लुङ' प्रत्यय है। (२) आगत: । इस पद में इस सूत्र से भविष्यत्काल में निष्ठा' (३।२।१०२) से क्त' प्रत्यय है। (३) आगच्छति। इस पद में इस सूत्र से भविष्यत्काल में वर्तमाने लट् (३।२।१२३) से लट्' प्रत्यय है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003297
Book TitlePaniniya Ashtadhyayi Pravachanam Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanacharya
PublisherBramharshi Swami Virjanand Arsh Dharmarth Nyas Zajjar
Publication Year1997
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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