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________________ [40]... प्रथम परिच्छेद अभिधान राजेन्द्र कोश की आचारपरक दार्शनिक शब्दावली का अनुशीलन श्री महावीर पञ्चकल्याणक पूजा की रचना आचार्य विजय 40. सकलैश्वर्य स्तोत्र-41:राजेन्द्र सूरीश्वरजी महाराजने अपने जीवन में अंतिम वर्षावास के समय आचार्य श्रीमद्विजय राजेन्द्र सूरीश्वरजी ने इस स्तोत्र की रचना बडनगर में की थी। इसी पूजा के 'कलश' के अनुसार इसकी रचना गोल नगर (जि जालोर) राजस्थान में वि.सं 1936 में की है जैसा वि.सं 1963 की आषाढ सुदि दशमी, स्वाति नक्षत्र और रविवार के कि स्तोत्र के चरम श्लोक के अनुसार ज्ञात होता हैदिन हुई हैं।37 "रसगुणनवचन्द्रे वत्सरे गोलपु-ममुमकृतसुभक्त्या श्रीलराजेन्द्रसूरिः । 37. राजन्द्र सूर्योदय-38 : सकलजिनवराणां सुस्तवं पापनाशं, भवतु सकलसिद्धिप्रापक आचार्य श्रीमद्विजय राजेन्द्र सूरीश्वरजीने वि.सं 1960 (गुजराती पाठकानाम् ॥24॥ 1959) में सूरत चातुर्मास में इस ग्रंथ की रचना की है। संस्कृत भाषा में रचित इस स्तोत्र में 23 श्लोक अनुष्टुप इस पुस्तक में सूरत में पंन्यास चतुरविजयजी के साथ छंद में एवं अंतिम 24 वाँ श्लोक मालिनी छंद में हैं। इसमें प्रथम हुए अनादि तीन थुइ और अर्वाचीन चार थुइ एवं शास्त्रीय समाचारी श्लोक में अर्हन्त देव को, द्वितीय में चारों निक्षेप से समस्त जिनेश्वरों (आचार पालन के नियम) संबंधी शास्त्रार्थ का वर्णन किया है को एवं तृतीय से 22 पर्यंत जैन सिद्धांतानुसार महाविदेह में वर्तमान जिसे पढने से पंन्यास चतुरविजयजी एवं उनके भक्तों की जैनागम श्री सीमंधरादि 20 तीर्थंकरों की स्तुति की हैं।242 23 वें श्लोक शास्त्र संबंधी अज्ञानता का सहज परिचय होता है और विजेता में सर्व गणधर-केवलि भगवंत एवं समस्त साधु भगवंतों को वंदन आचार्य श्रीमद्विजय राजेन्द्र सूरीश्वरजी के अगाध श्रुतज्ञान का भी किया है। अंतिम 24 वें श्लोक में 'प्रशस्ति' हैं। पाठक को अनुभव होता हैं। इस स्तोत्र की भाषा-शैली प्राञ्जल, भक्तिप्रधान, भाववाही, इसका प्रकाशन उसी समय गुजराती वि.सं. 1959, भाद्रपद अलङ्कार एवं तुक युक्त हैं। इस स्तोत्र पर कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य मास/अगस्त 1903 में पुस्तकाकार में एवं 'देशीमित्र' नामक समाचार श्री हेमचंद्राचार्य के सकलार्हत् स्तोत्र का प्रभाव पूर्णरुपेण परिलक्षित पत्रमें हुआ था। होता हैं। यह स्तोत्र अनेक ग्रंथों में मुद्रित है, शाश्वत धर्म मासिक38. विशंति-विहरमान जिन-चतुष्पदी:39: अंक-जनवरी 2001 में यह स्तोत्र हिन्दी अनुवाद सहित प्रकाशित इस ग्रंथ की रचना आचार्यश्रीने वि.सं. 1946 में कार्तिक किया गया है। शुक्ल पंचमी (ज्ञान पंचमी) के दिन सियाणा (राज.) में पूर्ण की थी। 'गागर में सागर' समान इस लघु ग्रंथ में चौपाई, हरिगीत 41. स्वगच्छीय मर्यादापट्टकम्43:एवं इकतीसा छंद में जैनागमों के अनुसार पाँच महाविदेह क्षेत्रों में पूर्वाचार्यों की तरह आचार्य श्रीमद्विजय राजेन्द्र सूरीश्वरजीने विहरमान वर्तमान बीस जिनेश्वरों के नाम, जननी, जनक, सहधर्मिणी, वि.सं. 1956 में शिवगंज में स्वगच्छीय साधु-साध्वी के लिए आचारलंछन, विजय (देश), नगरी, तनु-वर्ण आदि का वर्णन किया हैं। पालन एवं अनुशासन हेतु आचार नियमों की रचना की जिसे मर्यादापट्टक इसका प्रकाशन वि.सं 1991/इ.स. 1935 में श्री राजेन्द्र प्रवचन कहते हैं। इस मर्यादापट्टक में 25 नियम है जिसमें स्व-गच्छीय साधुकार्यालय-खुडाला (राज.) से किया गया हैं। साध्वी की चैत्यवंदन-(उत्कृष्ट देववंदन)-सामायिक-प्रतिक्रमण-साधु/ 39. शांतिनाथ स्तवन: साध्वी वंदन-आहार-विहार-चातुर्मास-अध्ययन-अध्यापन-उपकरण एवं (आवश्यक हेतु गर्भित लावणी एवं अन्य) अन्य साध्वाचार संबंधी विधियाँ तथा चतुर्विध संघ की अनुशासन श्रावक मूलचन्द फूलचंद के आग्रह से आचार्य श्रीमद्विजय व्यवस्था का वर्णन किया गया हैं। राजेन्द्र सूरीश्वरजीने इस स्तवन की रचना वि.सं. 1942 के आसोज 42. साधुवैराग्याचार सज्झाय :वदि दशमी के दिन धोराजी नगर (गुजरात) चातुर्मास में की थी।240 इस सज्झाय की रचना भी आचार्यश्रीने वि.सं. 1946 में इसमें दो ढालें हैं। आचार्यश्री ने प्रथम काव्य में जैन सिद्धांतानुसार सियाणा (राज.) वर्षावास में की हैं। देववंदन एवं सामायिक विधि एवं द्वितीय में प्रतिक्रमण विधि सूत्रों इसमें 26 गाथा में साध्वाचार के दोषों का वर्णन कर, उसका के नाम एवं क्रियाविधि का महिमा सहित वर्णन किया हैं। प्रायश्चित दंड दिखाकर साधुओं को ज्ञानर्भित वैराग्य वासित जीवन त्रिस्तुतिक सूत्र-साक्षी गर्भित श्री शांतिजिन लावणी : सावधानीपूर्वक यापन करने का निर्देश दिया हैं। जैसा कि इसके नाम से प्रत्यक्ष हैं, आचार्यश्री ने इस लावणी 237. श्री जिनेन्द्र पूजा संग्रह पृ. 63, श्री महावीर कल्याणक पूजा, कलश-4 में प्राचीन त्रिस्तुतिक सिद्धांत के शास्त्रोक्त प्रमाणों के सूत्रों के नामों 238. राजेन्द्र सूर्योदय, प्रस्तावना, प्रथमावृत्ति, सन् 1903 का छः श्लोकों में वर्णन किया है। इसका रचनाकाल या स्थान 239. ग्रंथ, प्रस्तावना श्री पञ्चसप्ततिशतस्थान एवं श्री विहरमान जिन चतुष्पदी प्राप्त नहीं हुआ है किन्तु इसकी रचना से ऐसा ज्ञात होता है कि 240. क. कलश-मूलचन्दसुत फूलचन्द आग्रह, पडिकमणा विधि ज्ञानथी। आवश्यकविधिगभित श्री शान्तिनाथ स्तवन इस लावणी की रचना किसी शास्त्रार्थ के बाद की गयी है जिससे ख. संवत द्वि-चउ-अङ्क - शशी में, दशमी वदि आशोज । गेय स्तवन के माध्यम से जन-साधारण को भी सूत्र-सिद्धांत की जिनजी विधि मारग दियो मुजने ॥23।। -वही जानकारी प्राप्त हो सकें। 241. सकलैश्वर्य स्तोत्र, श्री राजेन्द्र स्तुति समुच्चय पृ. 16 से 18 ये और इसके अतिरिक्त आचार्यश्री द्वारा रचित श्रीशांतिनाथ 242. जैन आगमों के अनुसार जंबुद्वीप के 9, घातकीखंड के दो एवं अर्ध पुष्करावर्त द्वीप के 2 -एसे 5 महाविदेह में 5x4%= 20 तीर्थंकर (एकभगवान् के अन्य भी 12 (बारह) स्तवन 'प्रभु स्तवन सुधाकर में एक विदह में 4-4) वर्तमान में विहरमान हैं। मुद्रित हैं। 243. यह पट्टक कल्पसूत्रार्थप्रबोधिनी में 'जीवनपरिचय' के बाद मुद्रित हैं। 244. प्रभुस्तवन सुधाकर पृ. 222 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003219
Book TitleAbhidhan Rajendra Kosh ki Shabdawali ka Anushilan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDarshitkalashreeji
PublisherRaj Rajendra Prakashan Trust
Publication Year2006
Total Pages524
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size17 MB
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