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________________ [358]... चतुर्थ परिच्छेद अभिधान राजेन्द्र कोश की आचारपरक दार्शनिक शब्दावली का अनुशीलन भगवान महावीर के लिए सिंह अनागार को औषधिदान के प्रभाव कहीं भी 'जाकार' प्राप्त नहीं होता। साधु भगवंत सभी जीवों को से रेवती श्राविकाने तीर्थंकर नामकर्म उपार्जित किया।86 मुनि को शिवतुल्य मानकर उन्हें मान देते हैं, किसी के निंदा-अपमान नहीं वस्त्रदान के प्रभाव से चण्डपालने दूसरे/ध्वज भुजङ्गकुमार के भव करतें इससे उनको दान देनेवाला यश का भागी बनता हैं। साधु में देव सानिध्य और सर्वप्रकार की राज-ऋद्धि प्राप्त की।87 मुनि भगवंत नमस्कार महामंत्र में स्थित हैं। जगत के उच्चतम पाँच पद को पात्र दान के प्रभाव से धन को दूसरे धनपति के भव में जमीन में स्थान प्राप्त हैं और वे कभी भी यह ऊच्च है, यह निम्न (नीचा) में से स्वर्ण पात्रों की प्राप्ति हुई 188 स्वयं की दरिद्रावस्था में भी है (नीचि जाति का) है एसे भेद-भाव नहीं करते अतः सुपात्र दान थोडे में से थोड़ा दान देने के फलस्वरुप सुमित्रने धनसेन के दूसरे से उच्च गोत्र बंध होता हैं। साधु कभी आत्म-प्रशंसा नहीं करते भव में गर्भ श्रीमंत के रुप मे जन्म लिया, क्रमश: कई बार लक्ष्मी इससे उनको आहार-दान करनेवाला कभी भी नीचगोत्र नहीं बाँधता । प्राप्त की, आयुः पूर्ण कर देवलोक में गया और सात-आठ भव में साधु भगवंत श्रेष्ठ अभयदान देते हैं, सबको धर्मलाभ देते मोक्ष प्राप्त करेगा। हैं, अपने शुभ पर्यायो में रमणतारुप भोग में रहते हैं, और क्षमाइस प्रकार दान धर्म एसा प्रभावशाली होने से गृहस्थ को नम्रता आदि आत्म गुणों में मग्नतारुप उपभोग में रहते हैं और संयम सुपात्रदानपूर्वक ही भोजन करना चाहिए। आज के भी दीक्षित, में उक्तष्ट वीर्य का उपयोग करते हैं। इस तरह वे पाँचो प्रकार की सामायिक चारित्र मात्र के धारक भी मुनि के लिए आहार, औषध, अन्तराय से मुक्त है और पाँच लब्धि के स्वामी हैं। अतः साधुदान वस्त्र, पात्र हेतु श्रावक को स्व-द्रव्य (धन) व्यय करना चाहिए; इतना से सभी प्रकार के सब ही विघ्न दूर हो जाते हैं और जीव अनेक ही नहीं, अपितु धर्मोद्योतकर साधु-साध्वी को अपने पुत्र-पुत्री आदि लब्धियों का स्वामी बनता हैं। को भी उनमें वैराग्य भाव जगाकर समर्पित करना चाहिए। अभिधान राजेन्द्र कोश में दान धर्म की महिमा बताते हुए सुपात्रदान की महिमा : आचार्यश्री ने कहा है कि, "दान से प्राणी वश होते हैं, वैर नष्ट सुपात्रदान से दानांतराय के साथ लाभांतरायादि कर्म भी होता है, पराया व्यक्ति भी अपना होता है अतः श्रावक को सतत पूटत हा ज्ञाना गुरुभगवता का वहरान स ज्ञानावरणीय कर्म क्षय दान देना चाहिए।192 होता है, ज्ञान प्राप्त होता हैं। 'साधुनां दर्शन पुण्यं' - जिन्होंने 7. शील :अपनी पाँचो इन्द्रियों पवित्र रखी है और साधना में सतत जागृत अभिधान राजेन्द्र कोश में आचार्य श्रीमद्विजय राजेन्द्र सूरीश्वरजीने है, एसे मुनि भगवंतो के दर्शन मात्र से और वहोराने से दर्शनावरण 'शील' के विभिन्न अर्थ बताते हुए कहा है कि, शील अर्थात् समाधान, कर्म नष्ट होता हैं। और पाँचो इन्द्रियाँ अच्छे रुप में प्राप्त होती व्रतादिसमाधान"3, यमनियम, क्रोधादि का उपशम 5, अनुष्ठान%%, हैं। जगत के समस्त जीवों को पीडा नहीं उपजाने और अभयदान व्रत विशेष” (सर्वथा ब्रह्मचर्य पालनरुप गृहस्थ का शीलव्रत), उत्तर देनेवाले गुरु-भगवंतो को आहार-पानी देने से शाता वेदनीय कर्म गुण, अणुव्रत, परद्रोहविरति100, उद्यतविहारित्व01, चारित्र102, का बंध होता है जिससे भविष्य में दाता को शाता ही शाता प्राप्त सर्वसंवर103, 18000 शीलांगरुप संयम, मद्यमांस-रात्रिभोजनादि होती हैं। साधु भगवंत परमात्मा के प्रति अडिग श्रद्धा धारण करते त्यागरुप आचार5, महाव्रत समाधान-पञ्चेन्द्रिय-जय-कषाय निग्रहहैं और भगवद्वचन में श्रद्धा होने से उन्हीं के कारण समस्त सांसारिक त्रिगुप्ति पालन106, सदाचार-देशविरति-सर्वविरति रुप चारित्र107, सुख-वैभव का त्याग कर संयमजीवन यापन करते हैं इसलिए साधु भगवंत को दान देने से निर्मल सम्यग्दर्शन प्राप्त होता है, 86. अ.रा.पृ. 6/577 इन्द्रियाँ नियन्त्रित रहती हैं। साधु भगवंत क्षमाप्रधान होते हैं अर्थात् 87. दानधर्म पृ. 289-29 कषायरहित होकर चारित्र का पालन करते है इससे साधुदान से 88. वही पृ. 30,31 भव्यात्मा क्षमादि गुणों को और चारित्र को प्राप्त करती हैं। जीव 89. वही पृ. 39 90. अ.रा.पृ. 4/2490 को समाधि प्राप्त होती हैं। साधु भगवंत हास्यादि से रहित होने 91. वही से किसी को अप्रिय नहीं होते अतः मुनिदान से दाता लोकप्रिय 92. अ.रा.पृ. 4/2489 बनता हैं। साधु भगवंत ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं अतः उनको 93. अ.रा.पृ. 7/898 दान देने से परम सौभाग्ययुक्त सुशीलता प्राप्त होती हैं। 94. वही, सूत्रकृताङ्ग-1/6 साधु भगवंत सूक्ष्म चेतना के द्वारा भी किसी भी प्रकार 95. वही, सूत्रकृताङ्ग-2/6 96. वही, सूत्रकृताङ्ग-2/1 के कोई भी जीव के आयुष्य को उपक्रम नहीं लगाते अतः उनको 97. वही, सूत्रकृताङ्ग-2/2 दान देने से परभव में निरुपक्रम (अकस्मातादि से नष्ट नहीं होनेवाला) 98. वही, ज्ञानधर्म कथाङ्ग 1/7 शुभ आयुष्य प्राप्त होता हैं। 99. वही, उपाशक दशाङ्ग-अध्ययन-2 साधु भगवंत सतत उपदेशदानादि के द्वारा परोपकार करते 100. वही, दशवैकालिक-9/1 101. वही, सूत्रकृताङ्ग-1/13 हैं। शुभ योग में प्रवृत्त होते हैं। इससे उनको दान देने से शुभ 102. वही, सूत्रकृताङ्ग-1/1/1 नामकर्म का उपार्जन/बंध होता हैं । साधु भगवंत वचनगुप्ति का पालन 103. अ.रा.पृ. 7/899 करते हैं, (किसी को कटाक्ष, कटुवचनादि नहीं कहते) इससे उनको 104. वही, आचारांग-1/5/2 दान देने से आदेय नामकर्म प्राप्त होता हैं। साधु किसी को जाकार । ___105. वही, उत्तराध्ययन-अध्ययन-14 106. वही, आचारांग-1/6/4 नहीं देते ('तु जा' एसा नहीं कहते) जिससे उनको दान देनेवाला 107. वही, उत्तराध्ययन-अध्ययन-7 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003219
Book TitleAbhidhan Rajendra Kosh ki Shabdawali ka Anushilan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDarshitkalashreeji
PublisherRaj Rajendra Prakashan Trust
Publication Year2006
Total Pages524
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size17 MB
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