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________________ वि० पू० २८८ वर्ष ] [ भगवान् पार्श्वनाथ की परम्परा का इतिहास कि मेरे प्रपितामह सम्राट चन्द्रगुप्त ने भी अनार्य देशों में जैनधर्म की जागृति की थी तो मैं इस पवित्र कार्य के लिये चुपचाप बैठ जाऊँ ? यह मेरे लिये उचित नहीं है । अतः मुझे भी इस बात का उद्योग अवश्य करना चाहिये । परन्तु यह कार्य केवल मेरे अकेले के उद्योग से पूर्णतया सफल होना मुश्किल है अतः इसमें जैन साधु भी शामिल किये जायें कि वे अनार्य देशों में जा जा कर जैन धर्म का उपदेश करें इत्यादि । सम्राट् सम्प्रति ने अपने विचारों को अपने गुरु आचार्य सुहस्तीसूरि की सेवा में जाकर निवेदन किया । इस पर आचार्यश्री ने बड़ी खुशी के साथ अपनी सम्मति दे दी और कहा कि यदि आप इस प्रकार जैनधर्म का प्रचार करना चाहते हो तो हम कब पीछे रहने वाले हैं ! हम यथा साध्य सब प्रकार से संयोग देने को तैयार हैं । बस, सूरीश्वर और सम्राट् एक मत हो उज्जैन नगरी में एक श्रमण सभा करने की तैयार की और तत्काल ही उसको कार्य रूप में परिणित करनेको तमाम श्रमणों एवं संघ को आमन्त्रण के लिए सम्राट ने अपने मनुष्यों को भेज दिये जिस आमन्त्रण को पाकर नजदीक ही नहीं पर बहुत दूर दूर से श्रमण संघ और श्राद्ववर्ग भी गहरी तादाद में उज्जैन नगरी में पधार गये । क्यों न आवे एक तो जीवित स्वामी की यात्रा, दूसरे प्राचार्य सुहस्ती जैसे धर्म-धुरंधरों का दर्शन,तीसरे राजा सम्प्रति का आमन्त्रण, चतुर्थ जैनधर्म के प्रचार निमित्त सभा का होना और उसमें यथासाध्य सहायता कर लाभ हासिल करना । जब श्रमणसंघ एवं श्राद्धवर्ग एकत्र होगये तो आचार्य सुहस्तीसूरि की अध्यक्षत्व में सभा हुई श्राचार्यश्री ने भगवान महावीर के धर्म की महत्ता बतलाते हुये राजा श्रेणिक, कोणिक, उदाई, नौनंद मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त, विन्दुसार और अशोक के राजत्वकाल का वर्णन और जैनधर्म के प्रचार के लिए अपनी ओजस्वी बाणी द्वारा इस प्रकार उपदेश दिया कि धर्मप्रचार में मुख्य राजसत्ता की आवश्यकता रहती है कहा भी है कि “यथाराजास्तथाप्रजा" मैं उम्मेद करता हूँ कि सम्राट् सम्प्रति इस कार्य को हाथ में ले तो निस्सन्देह सफलता प्राप्त कर सकते हैं जैसे अशोक ने बोद्धधर्म के प्रचार में सफलता पाई थी। इत्यादि सूरीश्वरजी के उपदेश ने उपस्थित चतुर्विध श्रीसंघ पर इतना जोरदार प्रभाव डाला कि उनकी अन्तरात्मा में धर्म प्रचार निमित्त एक दम बिजली चमक उठी और कहा कि पूज्यवर! आपका कहना सोलह आना सत्य है । कारण इस कार्य के लिये सम्राट सम्प्रति ही भाग्यशाली हैं और वे यदि इस कार्य को अपने हाथों में ले तो आसानी से सफलता प्राप्त कर सकेंगे और हम सब लोग इस पुनीत कार्य में यथा , साध्य सहायता करने को कटिबद्ध तैयार हैं । इत्यादि । सम्राट् सम्प्रति ने खड़े हो कर आचार्यश्री को नमस्कार करके नम्रतापूर्वक अर्ज की कि हे प्रभो ! आपश्री की और चतुर्विध श्रीसंघ की मेरे पर महान कृपा है कि इस कार्य का लाभ मुझे देना चाहते हो जिसको मैं अपना अहो भाग्य समझता हूँ पर इस वृहद् कार्य को सम्पादन करने के लिये केवल मैं अकेला ही समर्थ नहीं हो सकता हूँ। पर इसमें श्रीसंघ एवं विशेष कर आप पूज्य पुरुषों की भी जरूरत है । कारण, उन आनाय देशों में आखिर तो आप श्रमण संघ को पधार कर उपदेश देना पड़ेगा। सूरिजी ने कहा, राजन । श्रापका कहना सत्य है और वहाँ जाने के लिये हम तैयार भी हैं पर सब से पहला यह कार्य आपका है कि पहिले साधुओं के जाने योग्य क्षेत्र तैयार करने का उद्योग करें फिर हम अपने साधुओं को भी भेज देंगे। सूरीश्वरजी के उत्साहवर्धक शब्द सुन कर सम्राट् का उत्साह और भी बढ़ गया और उसने अपने २९८ national Jain Education Yernational For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003211
Book TitleBhagwan Parshwanath ki Parampara ka Itihas Purvarddh 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundarvijay
PublisherRatnaprabhakar Gyan Pushpamala Falodi
Publication Year1943
Total Pages980
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size32 MB
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