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________________ विविध कथाएँ २६३ ५. वज्जी कुल - स्त्रियों और कुल-कुमारियों के साथ न तो बलात्कार करते हैं और न बलपूर्वक विवाह करते हैं । ६. वज्जी अपनी मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करते । ७. वज्जी अहंतों के नियमों का पालन करते हैं, इसलिए अर्हत् उन के वहाँ पर आते रहते हैं । सात नियम जब तक वज्जियों में हैं और रहेंगे, वहाँ तक कोई भी शक्ति उन्हें पराजित नहीं कर सकती । प्रधान अमात्य ' वस्सकार' ने आकर अजातशत्रु को कहा - और कोई उपाय नहीं है, जब तक उनमें भेद नहीं पड़ता, वहाँ तक उनको कोई भी शक्ति हानि नहीं पहुँचा सकती । वस्सकार के संकेत से अजातशत्रु ने राजसभा में 'वस्सकार' को इस आरोप से निकाल दिया कि यह वज्जियों का पक्ष लेता है । वस्सकार को निकालने की सूचना वज्जियों को प्राप्त हुई । कुछ अनुभवियों ने कहा- उसे अपने यहाँ स्थान न दिया जाये । कुछ लोगों ने कहा -- नहीं, वह मागधों का शत्रु है इसलिए वह हमारे लिए बहुत ही उपयोगी है। उन्होंने 'वस्कार' को अपने पास बुलाया और उसे 'अमात्य' पद दे दिया । वस्सकार ने अपने बुद्धि-बल से वज्जियों पर अपना प्रभाव जमाया । जब वज्जी गण एकत्रित होते, तब किसी एक को वस्सकार अपने पास बुलाता और उसके कान में पूछता - क्या तुम खेत जोतते हो ? वह उत्तर देता- हाँ, जोतता हूँ । महामात्य का दूसरा प्रश्न होतादो बैल से जोतते हो अथवा एक बैल से ? दूसरे लिच्छवी उस व्यक्ति को पूछते-बताओ, महामात्य ने तुम्हारे को एकान्त में ले जाकर क्या बात कहो ? वह सारो बात कह देता पर वे कहते - तुम सत्य को छिपा रहे हो। वह कहता - यदि तुम्हें मेरे पर विश्वास नहीं है तो मैं क्या कहूँ ? इस प्रकार एक-दूसरे में अविश्वास को भावना पैदा की गई और एक दिन उन सभी में इतना मनोमालिन्य हो गया कि एक लिच्छवी दूसरे लिच्छवो से बोलना भी पसन्द नहीं करता । सन्निपात भेरी बजाई गई, किन्तु कोई भी नहीं आया । ' वस्सकार' ने अजातशत्रु को प्रच्छन्न रूप से सूचना भेज दी । उसने ससैन्य आक्रमण १ दीघनिकाय, महापरिनिव्वाणसुत्त, २ / ३ (१६) Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003190
Book TitleJain Katha Sahitya ki Vikas Yatra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDevendramuni
PublisherTarak Guru Jain Granthalay
Publication Year1989
Total Pages454
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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