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________________ विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख १६५ १०४ ( १८५) गोम्मटेश्वर के दक्षिण की ओर कूष्माण्डिनी के पादपीठ पर __(लगभग शक सं० ११००) श्रोनयकीर्ति सिद्धान्त-चक्रवर्तिगल शिष्यरु श्रीबालचन्द्रदेवर गुड्डु केतिसेट्टिय मग बम्मिसेट्टि माडिसिद यक्षदेवते।। [नयकीर्ति सिद्धान्त चक्रवर्ति के शिष्य बालचन्द्र देव के शिष्य बम्मि सेट्टि, केटि सेट्टि के पुत्र, ने यह यक्ष देवता प्रतिष्ठित कराया। ] १०५ ( २५४ ) सिद्धरबस्ती में उत्तर की ओर एक स्तम्भपर (शक सं० १३२०) ( पश्चिम मुख) श्रीमत्परमगम्भीरस्याद्वादामोघलान्छन । जीयात्रैलोक्यनाथस्य शासनं जिनशासनं ॥१॥ श्रीनाभेयोऽजितःशम्भव-नमिविमलास्सुब्रतानन्तधर्माश्चन्द्राङ्कश्शान्तिकुन्थू ससुमतिसुविधिश्शीतला वासुपूज्यः । मल्लिश्श्रेयस्सुपाश्रु जलजरुचिरनिन्दनः पार्श्वनेमी श्रीवीरश्चेति देवा भुवि ददतु चतुर्विशतिर्मङ्गलानि ॥२॥ वीरा विशिष्टां विनताय रातीमितित्रैलोकैरभिवण्ठनेते यः निरस्तका निखिलार्थवेदी पायादसौ पश्चिमतीर्थनाथः ॥३॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003151
Book TitleJain Shila Lekh Sangraha 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherManikchand Digambar Jain Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages662
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & History
File Size21 MB
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