SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 115
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ :ANIcomwwwmro wmwead. . . netv - - - - विशुद्धि केन्द्र इसका स्थान कण्ठ का मध्य भाग है। हठयोग में भी इसकी संज्ञा विशुद्धि चक्र है। तीन शक्ति केन्द्रों में यह सर्वोपरि है। वृत्तियों के परिष्कार का यह बहूत बड़ा माध्यम है। इसे बुढ़ापे को रोकने वाला माना जाता है। शरीरशास्त्रीय दृष्टि से चयापचय की क्रिया का संबंध कण्ठमणि (थायरायड ग्लैण्ड) से है। वह विशुद्धि केन्द्र के परिपार्श्व में है। चयापचय की क्रिया का संतुलन वृद्धावस्था को रोकने में सहायक बन सकता है। ०७ अप्रैल २००० (भीतर की ओर - ११४ - SaiRREDARE -MAHAmramdotAR N ONPaneer Jain Education InternationaFor Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003106
Book TitleBhitar ki Aur
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMahapragna Acharya
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2001
Total Pages386
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Spiritual
File Size10 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy