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________________ अकेला क्षीण कर सकता है । ध्यान का इतना महत्व है | इस महत्व को आंकना चाहिए। शक्तिशाली प्रयल मानसिक, वाचिक और कायिक- इन सब प्रयत्नों में विशुद्धि का सबसे अधिक शक्तिशाली प्रयत्न है ध्यान । हम कायोत्सर्ग की मुद्रा में बैठते हैं, शरीर को शिथिल कर देते हैं । प्रश्न होता है- प्रयत्न कहां रहा ? एक ओर प्रयत्न की बात, दूसरी ओर प्रयल कहां? कायोत्सर्ग में शरीर के प्रयत्न को समाप्त कर दिया । वाणी का मौन हो गया, प्रयत्न कहां रहा ? मन को एकाग्र कर लिया तो प्रयल कहां रहा ? एक ओर है सबसे शक्तिशाली प्रयत्न और दूसरी ओर है अप्रयल यानी प्रयत्न का अभाव । दोनों में विरोधाभास लगता है, पर विरोध नहीं है । मन, वाणी और शरीर- ये हमारे स्थूल शरीर के घटक हैं । इनके साथ आत्मा का प्रयत्न इतना तीव्र नहीं होता । जब ये तीनों निष्क्रिय होते हैं तब आत्मा का प्रयत्न तीव्र होता है, अनंत शक्ति तभी प्रकट होती है। शरीर में अनंत शक्ति कभी प्रकट नहीं होती है । वह तब प्रकट होती है जब मन, वाणी और शरीर- इनकी प्रवृत्ति का निरोध किया जाए। उस समय भीतर का भयंकर विस्फोट होता है और वह होता है आत्मा के प्रयत्न से । शरीर, मन और वाणी का प्रयत्न तीव्र होता है तब आत्मा का प्रयत्न शिथिल हो जाता है । जब इनका प्रयत्न मंद हो जाता है, तब आत्मा का प्रयत्न जागृत हो जाता है। प्रवृत्ति : निवृत्ति मनोविज्ञान की भाषा है- जब कांशियस माइंड सक्रिय रहता है तब अनकांशियस माइंड सोया रहता है और जब कांशियस माइंड निष्क्रिय बन जाता है, तब अनकांशियस माइंड सक्रिय बन जाता है । उस अवस्था में अनकांशियस मन में भरी हुई शक्तियां एक साथ जाग जाती हैं । ठीक यही स्थिति शरीर और आत्मा के प्रयत्न की है । शरीर, मन और वाणी का प्रयत्न है तब तक आत्मा का प्रयत्न प्रबल नहीं होता | जब ये तीनों शान्त होते हैं, प्रयत्न का विवेक २३ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003052
Book TitleJain Dharma ke Sadhna Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMahapragna Acharya
PublisherAdarsh Sahitya Sangh
Publication Year
Total Pages248
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size10 MB
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