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________________ साध्वाचार के सूत्र प्रश्न ७३. स्नातक निर्ग्रन्थ में शरीर कितने पाये जाते हैं? उत्तर-शरीर तीन-औदारिक, तैजस और कार्मण।' प्रश्न ७४. स्नातक निर्ग्रन्थ में समुद्घात कितने पाये जाते हैं ? उत्तर-एक-केवली समुद्धात। प्रश्न ७५. स्नातक निर्ग्रन्थ आराधक अवस्था में काल धर्म प्राप्त कर कौन सी गति में जाते हैं? उत्तर-मोक्ष गति में। प्रश्न ७६. स्नातक निर्ग्रन्थ उत्कृष्ट कितने भवों में होता हैं? उत्तर-एक भव।' प्रश्न ७७. स्नातक निर्ग्रन्थ एक समय में कितने नए हो सकते हैं? उत्तर-उत्कृष्ट एक सौ आठ। प्रश्न ७८. स्नातक निर्ग्रन्थ पूर्व पर्याय की अपेक्षा कितने हो सकते हैं? उत्तर-पृथक् करोड़ (दो करोड़ से नौ करोड़)। प्रश्न ७६. स्नातक निर्ग्रन्थ किस क्षेत्र में शाश्वत रहते हैं? उत्तर-महाविदेह क्षेत्र में। प्रश्न ८०. स्नातक निर्ग्रन्थ भरत-ऐरावत में कब-कब होते हैं? उत्तर-अवसर्पिणी के तीसरे-चौथे-पांचवें आरे में उत्सर्पिणी के तीसरे-चौथे आरे प्रश्न ८१. स्नातक निर्ग्रन्थ में कौनसा कल्प पाया जाता है ? उत्तर-कल्पातीत होते हैं, उनमें कोई कल्प नहीं होता। प्रश्न ८२. स्नातक निर्ग्रन्थ कितने पूर्व के धारक होते है ? उत्तर-वे पूर्व के धारक नहीं होते, केवलज्ञानी होते हैं। प्रश्न ८३. पांचों प्रकार के निर्ग्रन्थ जघन्य-उत्कृष्ट कितने होते हैं? उत्तर-जघन्य दो हजार करोड़ से कुछ अधिक (२६०२ करोड़) एवं उत्कृष्ट नव हजार करोड़। जघन्य यथा-पुलाक दो हजार, बकुश २०० करोड़, प्रतिसेवना कुशील ४०० करोड़, कषाय कुशील २००० करोड़, निर्ग्रन्थ कभी होते हैं और १. भगवती २५/६/३२५ ४. भगवती २५/६/४१५ २. भगवती २५/६/४३६ ५. भगवती २५/६/३०३ ३. भगवती २५/६/३३८ १. स्थानांग २/१०६ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003051
Book TitleSadhwachar ke Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRajnishkumarmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2011
Total Pages184
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size6 MB
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