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________________ साधु प्रकरण प्रश्न ६४. निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थ पूर्व पर्याय की अपेक्षा कितने साधु हो सकते हैं ? उत्तर-पृथक् शत (दो सौ से नौ सौ) मिल सकते हैं। प्रश्न ६५. निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थ किस क्षेत्र में शाश्वत रहते हैं? उत्तर-महाविदेह क्षेत्र में। प्रश्न ६६. निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थ भरत-ऐरावत में कब-कब होते हैं? उत्तर-अवसर्पिणी काल में तीसरे-चौथे-पांचवें आरे में होते हैं। (पांचवें आरे में ___ जन्मते नहीं) उत्सर्पिणी काल में दूसरे-तीसरे-चौथे आरे में होते हैं। (दूसरे में जन्म लेते हैं, दीक्षा नहीं) प्रश्न ६७. निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थ में कौनसा कल्प पाया जाता हैं? उत्तर-कल्पातीत।' प्रश्न ६८. निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थ कितने पूर्व के धारक हो सकते हैं? उत्तर-चौदह पूर्व। प्रश्न ६६. स्नातक निग्रंथ किसे कहते हैं? उनके कितने प्रकार हैं? उत्तर-शुक्लध्यान द्वारा समस्त घाति-कर्मों को क्षय कर जो शुद्ध हो गए है वे मुनि स्नातक निर्ग्रन्थ कहलाते हैं। इनके दो भेद हैं-सयोगी केवली और अयोगी केवली। प्रश्न ७०. स्नातक-निर्ग्रन्थ कितने प्रकार के होते हैं? उत्तर-पांच प्रकार के होते है १. अच्छवी-काययोग का निरोध करने वाला। २. अशबल-निरतिचार साधुत्व का पालन करने वाला। ३. अकर्मांश-घात्यकर्मों का पूर्णतः क्षय करने वाला। ४. संशुद्धज्ञानदर्शनधारी-अर्हत्, जिन, केवली। ५. अपरिश्रावी-सम्पूर्ण काय योग का निरोध करने वाला। प्रश्न ७१. स्नातक निर्ग्रन्थ में ज्ञान कितने पाये जाते हैं? उत्तर-एक-केवलज्ञान। प्रश्न ७२. स्नातक निर्ग्रन्थ में चारित्र कितने पाये जाते हैं? उत्तर-एक-यथाख्यात चारित्र।' १. भगवती २५/६/३०३ ३. भगवती २५/६/३१४ २. ठाणं ५/१८६ ४. भगवती २५/६/३०६ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003051
Book TitleSadhwachar ke Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRajnishkumarmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2011
Total Pages184
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size6 MB
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