SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 30
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ प्रवचन-माता प्रकरण ५. रूप-सत्य–वास्तविकता न होने पर भी धारण किये हुए रूप के अनुसार किसी व्यक्ति को उस नाम से बतलाना। ६. प्रतीत्य-सत्य-अपेक्षाविशेष से वस्तु को छोटी-बड़ी कहना। ७. व्यवहार-सत्य–लोक व्यवहार के अनुसार भाषा का प्रयोग करना। ८. भाव-सत्य-निश्चय-नय की दृष्टि से वस्तु में अनेक भाव होने पर भी उसे किसी एक भाव को मुख्यता देकर पुकारना। ९. योग-सत्य-क्रियाविशेष के संबंध से व्यक्ति को संबोधित करना। . १०. उपमा-सत्य-किसी एक अंश की समानता के आधार पर एक वस्तु की दूसरी वस्तु से तुलना करना।' प्रश्न १०. असत्य भाषा कितने प्रकार से बोली जाता है ? उत्तर-सामान्यतया इन दस कारणों से असत्य बोली जाता हैं? १. क्रोध-निःसत-यथा अपना पुत्र होने पर भी असत्य बोलना। क्रोधवश पिता कह देता है कि "दुष्ट! तू मेरा जाया है ही नहीं।"। २. मान-निःसृत-धन एवं बुद्धि न होने पर भी अभिमानवश मनुष्य अपनी धनिकता और बुद्धिमत्ता की झूठी प्रशंसा करने लगता है। ३. माया-निःसृत-धोखा देकर दूसरों को ठगा जाता है एवं बच्चों को बहलाने के लिए झूठ बोला जाता है। ४. लोभ-निःसृत व्यापार में लोभवश ग्राहक को थोड़ी कीमत में खरीदी हुई चीज अधिक कीमत में खरीदी हुई बतलाई जाती है। ५. प्रेय-निःसृत-दास न होते हुए भी मनुष्य प्रेम-मोह में अंधा होकर कह देता है कि 'मैं आपका दास हूं'। ६. द्वेष-निःसृत-द्वेषवश मनुष्य गुणी को निर्गुण, विद्वान् को मूर्ख एवं धनी को दरिद्र कह देता है। ७. हास्य-निःसृत-हंसी-मजाक, विनोद, मनोरंजन एवं मसखरी करते समय मनुष्य जान-बूझकर झूठ बोलता है। ८. भय-निःसृत-चोर आदि के भय से या दंड एवं अपमान के भय से व्यक्ति झूठ बोलता है। ९. आख्यायिका-निःसत-कथा आदि कहते समय मनुष्य मनगढ़त बात कह देता है। १.स्था. १०/८६, प्रज्ञापना पद ११/८६०२. प्रज्ञापना पद ११/८६३, स्था. १०/६० Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003051
Book TitleSadhwachar ke Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRajnishkumarmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2011
Total Pages184
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size6 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy