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________________ २२ भीमद्रराजचन्द्रजैनशाखमालायाम् । करूपत्वं वस्तूनां भवतीत्येकरूपत्वं सविश्वरूपायाः प्रतिपर्यायनियताभिरेव सत्ताभिः प्रतिनियतैकपर्यायाणामानन्स्यं भवतीत्येकपर्यायत्वमनन्तपर्यायाः । इति सर्वमनवद्यम् अवान्तरसत्ता प्रतिपक्ष इति शुद्धसंग्रहनयविवक्षायामेका महासत्ता अशुद्धसंग्रहनयविवक्षाया व्यवहारनयविवक्षायां वा सर्वपदार्थसविश्वरूपाद्यवान्तरसत्ता सप्रतिपक्षव्याख्यानं सर्व नैगमनयापेक्षया ज्ञातव्यं । एवं नैगमसंग्रहव्यवहारनयत्रयेण सत्ताव्याख्यानं योजनीयं, अथवैका महासचा शुद्धसंग्रहनयेन, सर्वपदार्थाद्यवान्तरपत्ता व्यवहारनयेनेति नयद्वयव्याख्यानं कर्तव्यं । अत्र शुद्धकथंचित्प्रकार सत्ताको अपेक्षासे एकता है। सत्ता वही है जो नित्यानित्यात्मक है। उत्पादव्ययध्रौव्यात्मक जो है वह सकल विस्तार लिये पदार्थों में सामान्य कथनके करनेसे सचा एक है समस्त पदार्थोंमें रहती है, क्योंकि 'पदार्थ है' ऐसा जो कथन है और ‘पदार्थ है' ऐसी जो जाननेकी प्रतीति है सो उत्पादव्ययध्रौव्यस्वरूप है। उसीसे सत्ता है। यदि सत्ता नहीं होय तो पदार्थों का अभाव होजाय, क्योंकि सत्ता मूल है, और जितना कुछ समस्त वस्तुका विस्तार स्वरूर है, सो भी सत्तासे गर्मित है । और अनन्त पर्यायोंके जितने भेद हैं, उतने सब इन उत्पादव्ययध्रौव्य स्वरूप भेदोंसे जाने जाते हैं। यह हो सामान्यस्वरूप सत्ता विशेषताको अपेक्षासे प्रतिपक्ष लिये है। इस कारण सत्ता दो प्रकारकी है, अर्थात् महासत्ता और अवान्तर सत्ता । जो सत्ता उत्पादव्ययध्रीव्यरूप त्रिलक्षणसंयुक्त है, और एक है, तथा समस्त पदार्थों में रहती है, समस्तरूप है, और अनन्तपर्यायात्मक है सो तो महासत्ता है, और जो इसको ही प्रतिपक्षिणी है, सो अबान्तरसत्ता है । सो यह महासत्ताकी अपेक्षासे असत्ता है। उत्पादादि तीन लक्षण गर्भित नहीं है, अनेक है. एक पदार्थ में रहती है, एक स्वरूप है, एक पर्यायात्मक है। इस प्रकार प्रतिपक्षिणी अवान्तरसत्ता जाननी । इन दोनों में से जो समस्त पदार्थों में सामान्यरूपसे व्याप रही है, वह तो महासत्ता है। और जो दूसरो है सो अपने एक एक पदार्थके स्वरूपमें निश्चिन्त विशेषरूप वतॆ है, इस कारण उसे भवान्तरसत्ता कहते हैं.। महासत्ता अवान्तर सत्ताको अपेक्षासे असत्ता है । अवान्तर सत्ता महासत्ताकी अपेक्षासे असत्ता है. इसी प्रकार सत्ताको असचा है। उत्पादादि सीन लक्षणसंयुक्त जो सत्ता है, वह ही तीन लक्षणसंयुक्त नहीं है । क्योंकि जिस स्वरूपसे उत्पाद है, उसकर उत्पाद ही है; जिस स्वरूपकर व्यय है, उसकर व्ययही है; जिस स्वरूपकर ध्रौव्यता है, उसकर ध्रौव्य ही है। इस कारण उत्पादव्ययध्रौव्य जो वस्तुके स्वरूप हैं, उनमें एक एक स्वरूपको उत्पादादि तान लक्षण नहीं होते. इसी कारण तीन रक्षणरूप सत्ताके तीन लक्षण नहीं हैं; और उस ही महासत्ताको अनेकता है, क्योंकि निज निज पदार्थों में जो सत्ता है उससे पदार्थोंका निश्चय होता है। इस कारण सर्वपबार्थव्यापिनी महासत्ता निज निज एक पदाथको अपेक्षासे एक एक पदार्थमें विष्ट है, Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002941
Book TitlePanchastikaya
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherShrimad Rajchandra Ashram
Publication Year1969
Total Pages294
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size18 MB
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