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________________ पावा पावाभिगमा पावरुई पाणवहकयरई पाणवहरूवाणुट्टाणा पाणवहकहासु अभिरमंता तुट्ठा पावं करेत्तु होंति य बहुप्पगारं । २१. ये पूर्वोक्त विविध देशों और जातियों के लोग तथा इनके अतिरिक्त अन्य जातीय और अन्य देशीय लोग भी, जो अशुभ लेश्या, परिणाम वाले, निकृष्ट विकृत धारा वाले हैं, वे जलचर, स्थलचर, नख वाले, उरग, नभचर, संडासी जैसी चोंच वाले आदि जीवों का घात करके अपनी आजीविका चलाते हैं। वे संज्ञी, असंज्ञी, पर्याप्त और अपर्याप्त जीवों का हनन करते हैं। वे पाप बुद्धि वाले पाप को ही अपनाने योग्य मानते हैं । पाप में ही उनकी रुचि - प्रीति होती है। वे प्राणियों का घात करके प्रसन्नता व आनन्द का अनुभव करते हैं। उनका काम प्राणवध करना ही होता है। प्राणियों की हिंसा की कथा - वार्त्ता में ही वे आनन्द मानते हैं। वे अनेक प्रकार के पापों का आचरण करके सन्तोष अनुभव करते हैं । 21. The natures of the above-said states and tribes and even those of other states and tribes who are of maligned thought-activity and bad attitude and who are going astray, earn their livelihood by killing aquatic creatures, the creatures living on land, and moving in the sky, the nail-bearing animals, the Urags and those who have sharp beaks. They kill the living beings who have a mind and those who do not possess it, the developed beings and those who are not fully developed. Such people of maligned intellect, believe that it is good for them to engage in bad activities. They like to engage in sin. They feel happy and elated by killing living beings. They feel satisfied by committing sin of various types. फ्र विवेचन प्रस्तुत पाठ में कुछ पारिभाषिक शब्द प्रयुक्त हुए हैं, जैसे-संज्ञी, असंज्ञी पर्याप्त और अपर्याप्त । उनका आशय इस प्रकार है संज्ञी - संज्ञा अर्थात् मनन करने की विशिष्ट चेतना आगे-पीछे के हिताहित का विचार करने की शक्ति जिन प्राणियों को प्राप्त है, ऐसे प्राणी पंचेन्द्रियों में ही होते हैं। असंज्ञी - जिन जीवों को मन नहीं होता है असंज्ञी कहलाते हैं, एक इन्द्रिय जीवों से लेकर चार इन्द्रिय वाले सभी जीव असंज्ञी होते हैं और पंचेंद्रिय में भी होते हैं। पर्याप्त - जिन जीवों को शरीर आदि की इन्द्रियाँ पूर्ण प्राप्त हो चुकी हैं, वे पर्याप्त कहलाते हैं। अपर्याप्त - जिन जीवों को शरीर आदि की इन्द्रियाँ पूर्ण प्राप्त नहीं हुई हैं, वे अपर्याप्त कहलाते हैं। Elaboration-In this paragraph, some technical terms have been used for instance sanjni, asanjni, paryapt, aparyapt. The purport of these words is as under श्रु. १, प्रथम अध्ययन : हिंसा आश्रव (35) Jain Education International Sh. 1, First Chapter: Violence Aasrava 6955 55 5 5 5 5 5 5 5 5 5 5 5 5 5 5 5 5 5 5 5 5 5 5 5 5 5 5 95 95 95 96 9 For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002907
Book TitleAgam 10 Ang 10 Prashna Vyakaran Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmarmuni, Varunmuni, Sanjay Surana
PublisherPadma Prakashan
Publication Year2008
Total Pages576
LanguageHindi, English
ClassificationBook_Devnagari, Book_English, Agam, Canon, Conduct, & agam_prashnavyakaran
File Size19 MB
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