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________________ पद्यानुवाद - स्व देह में रहे हुए इन्द्रियादि महातस्करो , लगे हुए कषायादि भी कर्मरूपी ये तस्करो । वे सभी को निज शक्ति से जिसने ही जीत लिये हैं , उनको ही जग में जिनेन्द्र महादेव कहे जाते हैं ॥ ४ ॥ शब्दार्थ स्वशरीरके अपने अंग में । तिष्ठन्तः=रहे हुए। ये =जो। महान्तः=बहुत बड़े । तस्कराः=चोर हैं, वह । येन=जिस, देवेन देव से । निजिताः=जीते गये हैं । स तु =वह ही । महादेवः=महादेव । उच्यते कहे जाते हैं ।।४।। श्लोकार्थ - __ अपने शरीर में जो महान् तस्कर (चोर) रहे हैं, उनको जिस देव ने जीत लिये हैं वे ही महादेव कहे जाते हैं ।। ४ ।। भावार्थ अपने शरीर में ही जो महान् तस्कर (चोर) प्रच्छन्न विद्यमान हैं वे सभी तस्कर इन्द्रिय स्वरूप में प्रात्मसम्पदा का सतत हरण करने की ताक में रहते हैं । अनन्त ज्ञानादिक से समलंकृत जिस देव ने उनको जीत लिया है, वह जितेन्द्रिय देव ही महादेव है, अन्य नहीं ।। ४ ।। श्रीमहादेवस्तोत्रम्-१३ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002760
Book TitleMahadev Stotram
Original Sutra AuthorHemchandracharya
AuthorSushilmuni
PublisherSushilsuri Jain Gyanmandiram Sirohi
Publication Year1985
Total Pages182
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size10 MB
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