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________________ ७६-७७ ] तृतीयः सर्गः कर्बुरासारसम्भूतं पद्मरागगुणान्वितम् । राजहंसनिषेव्यं च रमणीयं सरो यथा ॥ ७६ ॥ कर्बुरेति । कर्बुरस्य सुवर्णस्य य आसारः प्रसारस्तेन सम्भूतं सम्पन्नम् । पनरागमणेः गुणैरन्वितं सहितम् । राजान एव हंसास्तनिषेव्यं सेवनीयश्च तन्मण्डपं रमणीयं सर इव, यथा सरः कर्बुरस्याम्बुन आसारयुक्तं, 'जले हेम्नि च कर्बुरमिति कोशात् । तथा पपानां रागगुणेन अनुरागेणाङ्कितं राजहंसः पक्षिभिः सेव्यञ्च भवति । श्लिष्टोपमा ॥ ७६ ॥ . सा देवागमसम्भूता सेवनीया सुदृष्टिभिः । अकलङ्ककृतिः शाला विद्यानन्दविवर्णिता ।। ७७ ॥ सेति । सा पूर्वोक्ता मण्डपशाला देवस्यागमेन सम्भूता सुरसम्पादिता, सुदृष्टिभिर्जनः शोभननेत्रः सुन्दरजनर्वा सेवनीया अकलङ्का कलङ्कवर्जिता कृतिनिर्मितिर्यस्याः सा, यस्माद्विद्याया आनन्देन विवणिता । अनेन अष्टसाहनीनाम-न्यायपद्धतिश्च समस्यते । सापि देवागमनाम-स्तोत्रस्योपरि कृता, अकलङ्कनामकस्याचार्यस्य पूर्विकापि विद्यानन्दस्वामिना व्यावणितास्ति, सुदृष्टिभिः सज्जनश्च सेव्यत इति । क्लिष्टोपमा ॥ ७७ ॥ बगीचा मुकुर या 'मुकुल' अर्थात् कलियोंस भरा-पूरा होता है, वैसे ही इस मण्डपमें चारों ओर दर्पणादि लगे हुए हैं। बगीचेमें मोतिया आदि पुष्पोंके पौधे होते हैं तो इसमें भी सर्वत्र मोती लटक रहे हैं। बगीचेमें नयी कोंपलें दिखायी देती हैं तो यह मण्डप भी मूंगोंकी झालर आदिसे व्याप्त है।। ७५ ।। अन्वय : तत् रमणीयं कर्बुरासारसम्भूतं पद्मरागगुणान्वितं राजहंसनिषेव्यं च रमणीयं यथा सरः अस्ति । अर्थ : वह मंडप सरोवरके समान रमणीय है, क्योंकि सरोवरमें तो कर्बुर अर्थात् जलका आसार ( समूह ) होता है, तो मंडप भी कर्बुर या सुवर्णसे बना हुआ है । सरोवरमें पद्म अर्थात् कमल होते हैं, तो यह मण्डप भी पद्मराग मणिसे युक्त है। सरोवरमें राजहंस होते हैं तो यह मण्डप भी श्रेष्ठ राजाओंसे सेवित है ।। ७६ ॥ अन्वय : सा शाला देवागमसंभता सुदृष्टिभिः सेवनीया बकलङ्ककृतिः विद्यानन्दविवर्णिता ( अस्ति )। अर्थ : वह मण्डपशाला देवके आगमनसे बनी है, अर्थात् देवने आकर बनायी है। यहाँ सुन्दर नेत्र या शुभदृष्टिवाले लोग रहते हैं। यह कलंकरहित यानी Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002756
Book TitleJayodaya Mahakavya Purvardha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhuramal Shastri
PublisherDigambar Jain Samiti evam Sakal Digambar Jain Samaj
Publication Year1994
Total Pages690
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size14 MB
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