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________________ ( प्रस्तावम् ) मोका, पत्थावं प्रसंग | पन्नन्तिविज्जं— ( प्रज्ञप्तिविद्याम् ) प्रज्ञप्ति नामक विद्या | पठभारेसु - ( प्राग्भारेषु ) थोडे से नमे हुए पर्वतों के भागो में । पमायए - ( प्रमादयेः ) प्रमाद करना । [ २३० ] पहलसुकुमालाए ( पक्ष्मल सुकुमारया ) पुष्प के केसर की तरह सुकुमार से । पयई - ( प्रकृतिः ) स्वभाव | पयममी - (पदमार्गम्) पैदल रास्ता । पयहेज्ज - ( प्रजहीत ) त्याग करें । पया - ( प्रजाः ) मनुष्यों को । पयाई - ( पदानि ) पैरों को 1 पयाया - ( प्रजाता ) जन्म दिया | पयायामि - ( प्रजनयामि ) जन्म दूं । परज्झा---- ( परस्याः ) आत्मा से व्यतिरिक्त जड पदार्थों में दृष्टि रखनेवाले 1 Jain Education International परपत्यणापवन्नम् - ( परप्रार्थना-प्रपन्नम् ) भिखमंगा । परभाहए ( पराभ्याहतः ) अधिक आघात पाया हुआ । ( परम उत्तम भागवत संप्रदाय की दीक्षा । परम सुतिभूयाणं - ( परमशुचि भूतानाम् ) बहुत स्वच्छ --- परमभागवउदिक्खा भागवतदीक्षा ) हुए । परसुनियत्ते ( परशुनिकृतः ) परशु से कटा हुआ । परातिता - ( पराजिताः ) परा जय को पाये हुए । परिघोलेमाणा – (परिघूर्णमाणाः) घूमते हुए । परिपरतणं - (परिपर्यन्तेन) चारों बाजु । परित्तीकते - ( परितीकृतः, परि-मितीकृतः ) छोटा किया हुआ । परिभायतियं-- ( परिमाजयन्ति काम् ) उत्सव के रोज परोसनेवाली । For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002742
Book TitleJinagam Katha Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBechardas Doshi
PublisherKasturbhai Lalbhai Smarak Nidhi Ahmedabad
Publication Year2008
Total Pages264
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Canon, Agam, & agam_related_other_literature
File Size9 MB
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