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________________ गोरंगयपाणिक्षाचमाणुसोहश्लायविपुलुणावश्चामायरसगलसियसमश्वकप रिहियाई अाहरणईससहररहियाई मंदारमालइल्लयामेड दासरणंसुरमरिसहरूविण्डु। दिबहादेवयाठवणाईकाईलोख्यमगोणिध्यिाताई आणणधिम समणबंधुवकेकणुमणहवेंधु घता लमरावलिजायाखाहला मणसंखोहणुपुलश्या कंदापसविजिपवरदो नियवासरायणवल स्याजसहिया विश्यठाएगठे संठियवाण उपायरामाविलस कामठाचा अमुणातियाणपुरमिक्षलाउदारिईरापयडियटराठ झवन हंगुईविषिचारिलमिहादेवसंतकिपरिसिकंवगडलगाहोचश्या शिवशक्षकध्यवितवकवासे गहिरडंडहिलणाम किंउविर देवादिदेव फपिसुरणरखयरकउळवण विलसंउतजमजयखण से अखिउपरिण जिणचमारु आवतदातहातदिधरिखवालार्णसंसारहाधोसिडणिसका हाकिंचर। इपरिणहिंचरमरल तर्हिदेविणिबंधुचरविचाला सवपतिपश्हटलवणसास फेडिनमुहवडणमेह ३६ गोरे अंगों पर दौड़ता हुआ और सौन्दर्य से चमकता हुआ पानी ऐसा लगता है मानो द्रवित स्वर्णरस हो, सफेद १३ और सूक्ष्म वस्त्र पहना दिये गये और चन्द्रकान्त के समान कान्तिवाले आभरण भी। मन्दारमाला से युक्त जिसने मुट्ठी बाँध ली है तथा बाणों का सन्धान कर लिया है, और जिसे रोमांच हो आया है, ऐसा कामदेव मुकुट पहना दिया गया जो मानो विशाल सुरगिरि-शिखर के समान दिखाई देता है। देव के लिए देवताओं विलसित है। अफसोस है कि पूर्व के भाव को जानते हुए रति ने रागभाव को क्यों प्रकट किया? हे वसन्त, की स्थापना क्यों? फिर भी लोकाचार से वहाँ देवता स्थापित किये गये। स्वजन-बन्धु आनन्द से नाच उठे। तुम भी निवारित कर दिये गये थे। हाँ, हे वसन्त, तुम क्यों प्रेरित हो रहे हो? क्यों उत्पात मचाते हो और स्नेह के बन्धन के प्रतीक रूप में कंकण बाँध दिया गया। ईश्वर के पीछे लगते हो? कभी भी तुम तप की ज्वाला में पड़ सकते हो। मानो गरजती हुई दुन्दुभि यह कहती पत्ता-भ्रमरावली की डोरी के शब्द से मुखर मन के क्षोभ से पुलकित कामदेव ने क्रुद्ध होकर जिनवर। है कि हे देवाधिदेव, क्या तुम्हारा भी शत्रु हो सकता है? नागों, सुरों और मनुष्यों के द्वारा किये गये उत्सव के ऊपर अपना धनुष तान लिया॥१२॥ और बजते हुए तूर्य के जय-जय शब्द के साथ जिनकुमार ऋषभनाथ विवाह करने के लिए चले। आते हुए उन्हें दरवाजे पर रोक लिया गया मानो संसार से उन्हें मना कर दिया गया हो कि हे चरम-शरीरी, तुम क्यों विवाह करते हो? वहाँ नेग (निबन्ध) देकर और सुन्दर बात कर भुवनश्रेष्ठ वह भवन के भीतर प्रविष्ट हुए। Jain Education Interation For Private & Personal use only www.janeTTog
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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