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________________ तारायणदतेवायुसहकरपसर जायणहिंपयाहिमसस्यसम्मपरिदहदिजिरविपरिलमसापच सिदासिसिसश्सकमश्चन जिरिरकाऊनिरिखियउणुतातिपहिवडलस्कियठतिरिकावाही जिसरारुतणमितिर्दिभंगारतिहिंसणिगणमि समयमद वाचरुलंधियत सहायासुविधासधियठसहसझंगपिणा ऋाणवश्व विज्ञायणमनतिमसवर एक्षणजिसो दश्दीहरिय जोयाणययाससदिचरिम अहवसमुन्नहि मविमल श्रखिंडसरितापडुसिल जहितदिपवणपविन्नत ए जमजमयसपपरमजिए देवाहिवपतलाकाहिहात दमप्यरिसाहासणिणिहिठाना पळसदनिय क मिरिशिषदेत विषयसदियतेयपस्या गजरुरकराह वेलिवाहा मंदरुटंकश्ययामाजिषणालहोसावेंमेहगिरिणहरिसदावणिययासिरिसावश्फालसरणामि यतकानंघलश्चमरामनवमहार्णकोरलकलरवेणधवयफलिहसिलासणाईसवशपरकालखबर २६ । उससे दस योजन ऊपर असह्य किरणों के प्रसारवाला शरद्कालीन सरोवरों को खिलानेवाला सूर्य परिभ्रमण पवित्र शरीर, तीनों लोकों का कल्याण करनेवाले परम जिन को उस शिला के ऊपर सिंहासन पर स्थापित करता है। उसके अस्सी योजन ऊपर चन्द्रमा निरन्तर परिक्रमण करता है। उससे चार योजन ऊपर अश्विनी कर दिया। आदि सत्ताईस नक्षत्र देखे जाते हैं। फिर वहाँ से उतनी ही दूरी पर बुध दिखाई देता है। वहीं मैं शुक्र और पत्ता-असह्य तेजवाले स्वर्ण के रंग के स्वामी उस पर विराजमान ऐसे शोभित हो रहे हैं, मानो बृहस्पति का कथन करता हूँ। वहीं मैं मंगल और शनि को गिनता हूँ। इस प्रकार एक सौ दस योजन चलने मन्दराचल, लताओं को धारण करनेवाले वृक्षरूपी हाथों से शरीर को ढकता है ॥१२॥ पर उन्होंने शुद्ध आकाश पार किया। फिर वह एक हजार अट्ठानवे योजन जाता है। फिर इन्द्र एक सौ योजन जाता है। इतनी ही (सौ योजन) लम्बी और पचास योजन विस्तृत, आठ योजन ऊँची, हिम की तरह स्वच्छ जिननाथ को भावपूर्वक मानो वह हर्ष से अपनी लक्ष्मी दिखाता है, मानो फलभार से नमित वृक्षों से अर्द्धचन्द्र के आकार की पाण्डुशिला जहाँ शोभित है, वहाँ पहुँचने पर, जय-जय-जय करते हुए देवेन्द्र ने प्रणाम करता है। मानो उन पर चमरीमृग चमर ढोरते हैं। मानो कोयल सुन्दर शब्द में बोलती है, मानो स्फटिक मणियों की शिलाएँ स्थापित करता है। For Private & Personal Use Only Jain Education Internation www.jaine151.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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