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________________ मराठा तनचरविषणासविरागमालहिहासनमणयकरणमा बजईसलिलुतेवहपापल निपजश्णलिंगहाणातिविजिण धावणविसरिंददाति जिणधम्मलिजश्माजाल जियधम्मस्त्र कल्लाणमूखुचिता जिणधसमुचिमूढमशजापरखममहालाला चठरासीजाणिलरविरोनिवडिठसाकादिमिरमशाश्थामागला, मंडलपरमसरामचलिणिकमलिपिणणसासुखाश्यसमात्र -निहासणसागमितश्सासदाजियावास समिददीकारिसर अमित्रसवगतमुदियगानवरमियंक गणहरुरिसिसंघहोतिलयसूट जयरानपकहतरिमहा जाससिहरहारहविणासुरपाठसतिजगनवास गहिणिहुईअश्सरिडाकालमहिवा हरसिणवडिमिक्सपासमाल्टामदासश्सस्यपतसङ्घचलायासडोनिवडा वृष्यविहि चूठअदियाऽचमचारुसहिदिपाउदातहिंजकमल सरखझंजगुरुमति विमलुजर्दिवचश्तहिकावविपदख जहिवसस्ताहजककलिक साहासणुछत्रप्रतिष्पर्य तितिकापडणादाकहति लाजाणिजश्स्यरसंवरदिमिगमासँगबुगदि जिया ३३॥ और तप कर तथा राग-द्वेष का नाश कर, इन्द्रियशून्य और मृत्युरहित सुख प्राप्त करेगी। जितना बड़ा पानी, आकाश के चन्द्र गौतम ऋषि कहते हैं-"मुनिसंघ में श्रेष्ठ जयराजा इकहत्तरवें गणधर हुए। स्वयंसिद्ध कमल के उतना बड़ा नाल उत्पन्न होता है, इसमें भ्रान्ति नहीं है। जिनधर्म से पशु भी देवेन्द्र होते हैं। जिनधर्म आदरणीय, दुःख का नाश करनेवाले वे तीनों लोकों के अग्रवास (मोक्ष) में स्थित हुए। उनकी गृहिणी से मोह की जड़ नष्ट होती है। जिनधर्म सबके कल्याण का मूल है। सुलोचना अच्युत स्वर्ग में देवेन्द्र हुई। समय के साथ जिनवरेन्द्र धरती पर विहार करते हैं, वे अनन्त अनाहार घत्ता-जो मूढमति जिनधर्म को छोड़कर परधर्म में लगता है, चौरासी लाख योनियों के संकट में पड़ा के आभूषण से भूषित हैं। उनके साथ चलता हुआ सुरजन दिखाई देता है। आकाश से फूलों की वर्षा होती हुआ वह कहाँ निकल पाता है? ॥१२॥ है, चौंसठ चमर दुराये जाते हैं, वे जहाँ भी पैर रखते हैं वहाँ-वहाँ कमल होते हैं, गुरुभक्ति से विमल देवेन्द्र उन्हें जोड़ता है। वे जहाँ चलते हैं वहाँ किसी को दुःख नहीं होता। वे जहाँ ठहरते हैं वहाँ अशोक वृक्ष होता है, सिंहासन और तीन छत्र होते हैं और वे नाथ की त्रिभुवनप्रभुता घोषित करते हैं। मागध मण्डल के परमेश्वर चेलनारूपी कमलिनी के लिए नये सूर्य के समान क्षायिक सम्यक्त्वरूपी निधि घत्ता-जिनवर का कहा हुआ समस्त जीवों की भाषा के अंगस्वरूप परिणमित हो जाता है। सुअर, का ईश्वर, आगामी तीसरे भव में तीर्थंकर होनेवाले राजा श्रेणिक से, शंका को पोंछ देनेवाले, ब्राह्मणरूपी साँभरों, मृग, मातंग और अश्वों के द्वारा वह जान लिया जाता है "॥१३॥ १३ Jain Education Internaan For Private & Personal use only www.jan-b75ore
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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