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________________ लसण सिंदिया दिवसिय धवलहिंकमलचिंचिय प्रयुजिपतपसिरिसंधु असत्रिय सहयुगपति मित्र सदगुणराज नानूतहिंडिंजखिपिस पाइमा संलासेविनिहिल निदा सरी हरिसुप्फलियनेता उ वइसारे विपहे पयाहिवश मंगल कलसहिसिन | परिहाणइवरवनई वनडरपत हो दिवई मजगमणुपा उच्चावलुन दिलउ अवरुविजेचन ताम्रतहिंजे परिलमे चिसमायप रश्कारण संहृय कसायय खयरियस इरिपिडाजोडून पाहाणेोइदा उणिवाइ, सोपडंचसयूलविहिलियर दिइवञ्चस्योंपडिखलिड पु एफयंतफणिक्का रिस भरे मश्नरमंड मरठ विवरंतरे एमरुणेवितायविद्विष्मा सलग्गुहाडवारिस लक्ष्मि नवखंड दंडेंसारखंडिय कुलवणाकणुकखंडिया। उग्धा डेविदारुणरा दिव पाउवडाय लेंगर नदेजें पंडरिकणिनिसडे सुरमहिहरुवणुपेश | १४ पेकखंधा वालवि मुक्क् सन्नमुदिवस असो टक्कर माण्ड हास लगउनु मनोवसुप्रावश्मज रहउ ति | जगबंधुमऊबंधनाव। एवल ऐविजलदखदजोयश वसु वा लेपलणित किंससहरू मनहर सफेद खिले हुए कमलों से अर्चित किया, फिर उसने जिन के शरीर की श्री की भक्तिभाव से स्तुति की कि जो सब प्राणियों से मित्रता का भाव स्थापित करनेवाली थी। इतने में भद्र, प्रशस्त और हस्त-गुणों से शोभित यक्षिणी तत्काल वहाँ आयी। घत्ता – अखिल निधियों की स्वामिनी ने बात करके, जिसके नेत्र हर्ष से उत्फुल्ल हैं, ऐसे प्रजाधिपति भरत को यहाँ पर बैठाकर मंगल कलशों से अभिषेक किया ।। १३ ।। १४ सुन्दर अलंकार, वस्त्र, छत्र और दण्ड रत्न दिये तथा आकाश में गमन करनेवाली खड़ाउओं की जोड़ी दी। जो-जो सुन्दर था, वह वह दिया। तब जिसे रति के कारण ईर्ष्या उत्पन्न हुई है ऐसी विद्याधरी घूमती हुई वहाँ आयी। उस स्वेच्छाचारिणी ने राजा को देखा और आकाश से पत्थर का समूह गिराया। लेकिन दिव्य शत्रुरत्न से प्रस्खलित होकर वह गिरती हुई चट्टान चूर-चूर हो गयी। मुझसे रमण नहीं करते हुए पुष्पदन्त Jain Education International उरनदंडरन सिद्धानि श्रीयालेन नाग की फुंकार का जिसमें स्वर हैं ऐसे विबर के भीतर तुम मरो। इस प्रकार कहकर उस स्वेच्छाचारिणी ने उस शेरगुहा के द्वार पर एक बड़ी चट्टान फैला दी। लेकिन उस पृथ्वीपति ने अपने प्रचण्ड दण्ड से खण्डित करके उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। धत्ता-द्वार खोलकर राजा पादुका युगल से जाता है। आकाश में जाते हुए पुण्डरीकिणी नगर के निकट वह विजयार्ध पर्वत को देखता है ।। १४ । १५ वहाँ विमुक्त स्कन्धावार देखता है कि आज वह सातवाँ दिन भी आ पहुँचा। हे माँ ! तुम्हारा छोटा बेटा जो मनुष्य रूप में कामदेव के समान है, तीनों जग का बंधु, मेरा भाई, नहीं आया। ऐसा कहकर उसने आकाश की ओर देखा। तब वसुपाल ने कहा- क्या यह चन्द्रमा है ? For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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