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________________ यलिमपडिवालियद्यलिटलो चरणप्पणाणविद्यामहियलो निस्यधवालमाधोदानहालोव लामरूहमारिमदगला सायरमसिंचिददिसासणा घडविताणनिहालाकाणा पचदेडरता हृदेहलताणणपरिणाहसोहटा लेवमाणचलकम्पलउदाहतालवहामहालातवतालुया यवसहाही चिकवतकेलासमेटलतिरमणमिहरिहिधाउसहक्रिष्ट्याणमलाझ्ययता हस्तीरत्रसाधन पिडितकविधारण मखिविधारण रोयहाहरिसुणमादेठ पति श्रीपालेना उल्लासलालहाहरिवरुसलदोगलगनेशपधाधि दाव सुर्दकस्करधिवश्वालिंगसखंगचिवमपुरखश्मन प्णिपदमश्णुचकश्वव्यासहिसमश्यपधडपति। इसणहो अण्हादल्लिका मिमिणिजागहो बखचराचरणंत पश्सझवडविचजणंजलहरहो निम्महराहारसरण सहरावधाश्करणकरु याकवियसाधाधरणकसखअक्कमविकमणदसणमसल बलि पावलणावद्धवद ज्ञझाप्पास्यारुमहडवलाचनासाकारमशनसरुलालामथरता रनासंसामिपविगलकंद मंदरमहिहरूसुचदंडदिउचाश्छाशमहासोहानि जिस पर चंचल भ्रमर समूह आ-जा रहा था, जो चरणों से चाँपनेवाला और धरती को झुकानेवाला था। जिसने और छूता है, शरीर की रक्षा करता है और फिर मिलने के लिए करता है, फिर पास पहुँचता है, चारों ओर अपनी धवलता से आकाश को धवलित कर दिया था। जिसने अपने बल से ऐरावत हाथी को कुद्ध कर दिया है, घूमता है। श्वेत दाँतोंवाला वह हाथी अनेक रत्नों के आभूषणवाले कामिनीजन का अनुकरण करता है। वह जो शीतल मदजल बिन्दु से दिशामुख को सींच रहा है, जिसने अपने चार दाँतों से जंगल को उजाड़ दिया है। जो चंचल श्रीपाल उसके चारों पैरों के नीचे से जाता है। हकलाता और हुंकारता है और निकल आता है, उसे पंचदन्त ऊँचे शरीरवाला है, रक्षकों से त्रस्त जो परिधान से शोभित है, जिसके लम्बे चंचल कान पल्लव के समान लांघता है, कुम्भस्थल पर बैठता है, पूँछ, सूंड और वक्षस्थल प्राप्त करता है। वह हाथी को दसों दिशाओं हैं, लम्बी पूंछवाला, महाशब्द करता हुआ, लाल तालुवाला, लाल-मुख, नखवाला, कैलास पर्वत की तरह चमकता में घुमाता है। वह स्वामी ऐसा मालूम होता है, मानो मेघों में विद्युत्-पुंज हो। अपने गम्भीर स्वर से उसके हुआ स्वच्छ कान्तिवाला, लक्ष्मी से रमण करनेवाला श्रीपाल दौड़ा। उसने जंगल में भद्र नामक हाथी को देखा। भयंकर स्वर को पराजित करता और क्रीड़ा करता हुआ उसकी सैंड को अपने हाथ से पकड़ लेता है। जिसका घत्ता-शत्रुपक्ष का नाश करनेवाले उस हाथी को देखकर राजा का मन हर्ष से फूला नहीं समाया। बड़ो- शरीर आकुंचित है ऐसा प्रवंचना में कुशल वह क्रम से उसके दाँतोंरूपी मूसल का अतिक्रमण कर बलवान् बड़ी चट्टानोंवाले पर्वत से गरजता हुआ वह राजा ऐसा दौड़ा, मानो गरजता हुआ सिंह दौड़ा॥११॥ बल का निर्वाह करनेवाले महाबलशाली उससे खूब समय तक लड़कर१२ पत्ता-गजमद से परिपूर्ण, लीला से मन्थर उस हाथी को राजा श्रीपाल ने प्रसन्न कर लिया। मानो प्रबल उसके दाँतों को दबाता हुआ वह हाथी पर अपना हाथ डालता है। उसके सब अंगों का आलिंगन करता गुफाओंवाले मन्दराचल पहाड़ को उसने अपने बाहुदण्ड से उठा लिया हो॥१२॥ Jain Education International For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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