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________________ विद्यापरिनिवैता रएवियूउपशमनं सपलसेलहोजपपरथापविजोयणसगमण द्यकपरिसउजो गणेजागवि रिनपाघिसमस्यूलोबरिष्ठ देवेंदललडविन जनजाइशीपालु पधारिख सपिउंसपिसिरिमहरपठविवानिवनंदप्पुनर्दि गिरावदीयाविद्या निअंतरीकुराख्या ताहएखवियत फलिहसिलासलेकिउसखस दिहउजखमए वाश्यासीपिक्सा सेविणसुंदकातोयाकखएधवलिसविरे पसरियकरमख लागा। लग्नापळर चिंतश्वालविंसयनिनादेशसहावंसलिल विनिहरु तासर्दियघसरेकामुकिमारी घडकडियलसंपाश अगारी जलविवरंतरेमापसंती दिहातरुणनासरती तणविमजायविकोमलारसिउत्तण सकसमरयकामलाघनाचवलचूलतहिलोयपहिसामहिवामयणुकायणहिकल सकिदकाठी एनिमनिमल पहिहारयणायानलियटणसरसमाजवषण्वसणिय आयसवणहोसार सिउंमुडा हरिजश्तासहोचकपालवण कम्महजतातहीणकुसुमधषु ससिजश्नोतदाणकिदार गठारविजस्तासोणविळवाय सुखश्ताजनक्रालिसन्तहाकर तोमहाजातिमाएमहासरमज्ञ303 बलायउपकडावाण्डे विजापतलोकहाराणाकिजाणार्ड जजपावधासशसोसिरिवालण और वह अपना प्रच्छन्नरूप बनाकर स्थिर हो गया। विजयार्ध पर्वत के ऊपर स्थित होकर सौ योजन आकाश पत्ता-कलश को कमर में लिये हुए काम की उत्सुकता से युक्त धवल चंचल नेत्रों के द्वारा उस राजा के आँगन में जाकर शत्रु के द्वारा फेंके गये आकाश से गिरते हुए कुमार को देवेन्द्र ने शीघ्र अपनी विद्या से को देखा और जिसकी प्रतिभा आहत है, ऐसी उस बाला ने पूछा नहीं ॥८॥ धारण किया। धीरे-धीरे श्रीपर्वत के शिखर पर उसे स्थित (स्थापित) कर दिया। वह राजकुमार वहाँ भूख से व्याकुल होने लगा। स्फटिक मणि की चट्टानों से ढंका हुआ सरोवर था, उसने उसे देखा और जल समझकर जो सरस मन में उत्पन्न प्रणय से अत्यन्त स्निग्ध है, ऐसी उस भोली गोरी ने भवन में आकर पूछा-कि वह सुन्दर वहाँ गया। जल की इच्छा से विशाल श्वेत पत्थर पर फैलाये गये उसके हाथ पत्थर से जा लगे। यदि वह विष्णु है तो उसके चक्र और चिह्न नहीं हैं, यदि वह कामदेव है तो उसके पास कुसुमधनु नहीं है, बालक अत्यन्त विस्मित होकर सोचता है कि देश के स्वभाव के सदृश यहाँ पानी भी कठोर है ! इतने में उस यदि वह चन्द्रमा है तो उसके हरिण चिह्न नहीं है। अगर वह सूर्य है तो उसका अस्त नहीं हुआ है। यदि अवसर पर एक कामकिशोरी गोरी कमर पर घड़ा रखे हुए वहाँ आयी। उस तरुण ने जल के विवर्त में प्रवेश वह इन्द्र है तो उसके हाथ में बन नहीं है। हे आदरणीय ! महासरोवर में पानी के लिए जाते हुए मैंने एक करती हुई और पानी भरती हुई उसे देखा। उसने भी उस मार्ग से जाकर अच्छी कुसुम-रज से सुवासित कोमल युवक को देखा है, क्या जानूँ कि वह त्रिलोक का राणा हो? क्या जानूं कि जिसके बारे में लोग कहते हैं जल को पिया। वह वही श्रीपाल Jain Education Internations For Private & Personal use only www.jaine605org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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