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________________ जरव्ययालुजव्युत रणसरपुरषारिसकंधरहोर्चडासिदडमडिलकरदो जवण द्याधरुकऊनिन यहाकारणहरहा शिविरजकरयणायरहोझिालणज्ञ सथति। जरकखलरासपरखसजाहिजााहावाहररकसामानिवडा हिजलतकालापाले वश्वसनदारणाविबरेजगधंघले माग बाउनहारतमातासामारुमडकरडमारसर सवसकाहविनमा यवतण उमहनुमहासारख्खने पडदानावणसुखसविहिविहिवालविन्निविचनारिसमुनयागलगजंतदिहपंदिग्नय यहा अचयारिङ्गाहपटिमाया ग्रहविद्यासोलहसंजाया हटासोलह जष्ययालुजन वत्तासरायकरवतासहचसाहमउहरचठसहिदवनविल मनुहाइकरिग अडे अडाबाससलात तापियवाहितबकायसखाई जरा थलमहलखुपिडियाजकहिाघवास्यणियरदायवखुण कलि देवदोहिदाउन्लाउसंचलिग किसाहीकमनिक्षित कमानसाचनमा विमबुकमारदाचिनियन No1 तठहोतठसुपडिवापटंथिलवि या। घत्ता-वह यक्ष युवराज के लिए, जिसके कन्धे युद्धभार की धुरा धारण करने में समर्थ हैं तथा जिसका हाथ प्रचण्ड अस्थिदण्ड से मण्डित है, ऐसे दुर्धर निशाचर से भिड़ गये॥६॥ यक्ष कहता है कि-हे क्रोध से अभिभूत विद्याधर राक्षस, तू जा-जा। तू जलते हुए कालानल और विश्व के लिए संकटस्वरूप यम के मुखरूपी विवर में मत पड़। तेरी आयु नष्ट न हो, मेरे कुमार को तू मत सता। इस प्रकार अमर्ष के रस से वशीभूत महाआदरणीय वह महान् इस प्रकार कहता हुआ कहीं भी नहीं समा सका। राक्षस के द्वारा वह दो टुकड़े कर दिया गया। लेकिन वह व्यन्तर देव दो रूपों में होकर दौड़ा, उसने उन दोनों को आहत किया वे चार हुए, मानो गरजते हुए दिव्य दिग्गज हों। चारों को आहत करने पर वे आठ हो गये, आठ आहत होने पर सोलह हो गये, सोलह को आहत करने पर भयंकर बत्तीस हो गये, बत्तीस को आहत करने पर चौंसठ हो गये। चौंसठ के दो टुकड़े करने पर एक सौ अट्ठाईस हो गये। और वे भी दुगने बढ़ गये। इस प्रकार असंख्यात यक्षों ने जल-थल और आकाश को आच्छादित कर लिया। घत्ता-निशाचर का बाहुबल कम नहीं हुआ। देव ( यक्ष) का हृदय डिग गया कि क्या होगा ! उस कर्म को देखते हुए उसने कुमार के भविष्य की चिन्ता की॥७॥ ८ उसने उसके होनेवाले शुभ को स्वीकार किया। Jain Education International For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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