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________________ मंजारे झायममुहसंचारं दविविधरियचरित्रशतक्ततापसंपन्नताहणागुनच दागहतिहासणसमागदागरुहेरविदाताणिसुणियविसदसपश्वसनसंलखिउतलवारसिवाना चेविजापतिमाहियामजपचंजम्मंतरवाहमहावना मिजुन्नरुवमहवन्जरिव गडकाव मिपलिनउजहिंगहासंडमधरिणिय तहिं खादिपनारामाजादिषुपमणिकवलाल सिहिमसायाकहहिसंजाल पटियाएणतणपखारिय पाविणवेविधिकारियङमहंमुबलदार मिमपलाणा जगसमयअछियसहलीणा सोबरचकाईपईसकल अहनाहरशमणहोउक्कल। याउघश्चमलाउसमारनपत्राहठाववाढवयारा एम्बसणेविषुसखचडाविय विस्यहानिमडेविरसपान हिरवटेवर यालिंगहरूणेविरलुद्दविमिविपकाकरविणिवहन बताउटिदिवाक सीमसासंतणखयन्निद चित्रशचतहजलतजलतिहा जायजलामारी दहश्वपिविसिमिसिमियगनियिनिहणेपिनासी गरसवसवासढगालिन्त्रावणियुनिटासवणे सुत्र उनिइंधश्यपश्व इचिंगसङ्खमहिलएममाखिने परन्तु पुण्य के योग से वे मनुष्य हुए। दोनों विरक्त हो गये और उन्होंने चारित्र्य ग्रहण कर लिया। तप तपते हुए वे यहाँ आये हुए हैं। मेरा स्वामी उनकी वन्दना-भक्ति करने के लिए गया हुआ था, इसीलिए इतनी रात बीत जाने पर में आयी। इस प्रकार सुनी है विषदंश को प्रवंचना जिसने, ऐसे तलवर भृत्य को अपने पूर्वभव का स्मरण हो आया कि अपना अहितकर जानते हुए मैंने पूर्वजन्म में उन दोनों का वध किया था। घत्ता-क्रोध की आग से जलता हुआ वह उस वेश्या को झूठा उत्तर देकर वहाँ गया जहाँ पर नगर के बाहर संयम धारण करनेवाली वह आर्यिका स्थित थी॥१८॥ १९ उसे देखकर उसने फिर मुनि को देखा। और मरघट की लकड़ियों में आग लगायी। वापस आकर उन दोनों को पुकारा, और पापी ने उन्हें धिक्कारा कि "पूर्वभव में, जिसके साथ सुख में लीन तुम नष्ट हुई थी, अपने उस वर को तुमने इस समय क्यों छोड़ दिया ? तुम्हारा रतिरमण पास आया हुआ है। आओ मैं तुम्हारा मेल कराता हूँ। इस समय मैं तुम्हारे विवाह की अवतारणा करता हूँ।" यह कहकर उसने उसे कन्धे पर चढ़ा लिया और विरत (मुनि) के पास विरता (आर्या ) को ले गया। आलिंगन करो, यह कहकर रतिलुब्ध उन दोनों को एक-एक करके बाँध दिया। क्षय को स्थिरता देनेवाली जलती हुई चिता में उस भयंकर भीम ने उन्हें डाल दिया। सिकुड़ते हुए वे दोनों जल गये। और वह निर्दय अनासंग (मुनि आर्यिका) को जलाकर रस और मज्जा से विश्रब्ध और गन्ध से दुर्वासित आकर अपने घर में सो गया। (रात में) नींद में सोया हुआ वह बकता है-"अच्छा हुआ महिला के साथ मैंने दुश्मन को मार डाला।" Jain Education International For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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