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________________ एवहिवडमडमुहमहासारजाहंताघजपडिलासपूजावयाद्याक्षणसिनेसहपरिणामसमा पलिवियाघरमोदमहलधामशिण्णा जंतवालणेशछि ततत्रसुवमसलायजिद हर्तनबार प्रेष्टिशीप्रतिपत्ताव विसविधा केवविद्याश्रमदाहिनयचा ताणादणनियविणि नीअाहिकातवरम मुक्का वणिताश्तेलविवाददाशंण्ठपदविहरतश्ययार्शघिी तिकर्यना उसाणवाहिरदसखमाघरुआयएअझाएपसमा दजिहाजह मईकहिथकदापी गुशहराचारुचिराणा तिहतिहपिमयमण! प्रामाणिय निग्नच्छेविसातापमणिय सनियतहपणामुविस्यधि मगधरिधीरखाकंत सद्यहिंझायविहमसंसार वैदिउसारख्सपल डारसकुलवायुपवालहोहिलमा लामवालुपचनाएवापटप वचनकंसद्धनारनिणिहातोडियमश्मार लश्दा दिकचालि यवससारे माहियाखडदारणहक्कमरेहटेकवरदानणलमिपुत्रहामुर्खपदपदसिठपल्लमि या गुणवालहोकदमंगलसथाहिं लियकामिणिसमूहोसुणदिमाताएकवरसिरि निमछमार, रिधरणासहोरखा सोकवरमिलतणरुडपळेवि दियसुहसंबंधुझुकवि पञ्चश्यारावयश्मणवणु। महकमोजतनारनिाशाहनालायचा इस समय तुम मेरे लिए विशुद्ध महासती हो। आओ चलें।" इस पर वधू (विद्याधरी) कहती प्रणाम करते हुए प्रिय ने धीरबुद्धि गान्धारी की स्तुति की। सब लोगों ने जाकर संसार को नष्ट करनेवाले है-"जीवदयारूपी घी से सिक्त एवं शुभ परिणामरूपी समीर से प्रदीप्त आदरणीय रतिषेण मुनि की वन्दना की। उसने अपना कुलक्रम (उत्तराधिकार) गुणपाल को दिया और __घत्ता-घर-मोहरूपी प्रचुर धूम से रहित, तपरूपी ज्वाला से मैं दग्ध होती हूँ और हे प्रिय, तपी हुई लोकपाल प्रवजित हो गया। नि:स्पृह मद और काम को नष्ट करनेवाले और व्रतों के भार का पालन करनेवाले स्वर्णशलाका के समान मैं विशुद्ध होती हूँ।" ॥१५॥ स्वामी ने चार पुत्रों के साथ दीक्षा ले ली। लेकिन मैं सबसे छोटे पुत्र कुमार कुबेरदयित मोह में पड़कर यहाँ हूँ। मैं प्रभा से प्रहसित पुत्र का मुँह देखती हूँ। घत्ता-उसे प्रियदता (कुबेरकान्त की पत्नी) ने दूसरे सभी राजाओं को छोड़ते हुए अपनी कन्या कुबेर श्री इस प्रकार वह सैकड़ों मनुहारों से नहीं थकी। तब प्रिय ने उस विद्याधरी को मुक्त कर दिया। वहाँ वे कामिनी सैकड़ों मंगल करते हुए दे दी ॥१६॥ दोनों प्रवजित हो गये। और विहार करते हुए इस नगर में आये हैं। मुनि बाहर सुन्दर स्थान में ठहरे हुए हैं, और घर आयी हुई आर्यिका (विद्याधरी) ने जिस-जिस प्रकार गुह्य रहस्य से सुन्दर और विरागिणी कहानी बह कुबेरप्रिया अपने पुत्र से पूछकर, इन्द्रियों के सुख-सम्बन्ध की निन्दा कर, कबूतर पर्याय से मनुष्यत्व मुझसे कही है उस-उस प्रकार प्रियतम ने उसे सुना और निकलकर उसने उसे प्रणाम किया। भक्ति से उसे प्राप्त करनेवाले, Jain Education International For Private & Personal use only १६ www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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