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________________ रतनपत्तनातहोणुमहिलासखंधियातही उपलखेडहोवहिणहेजतहो खलिए विमाणुदिह सपिउववणे बंदिउसावेदोहिंवितरकणे उहिउधम्युरिसिदेखासिन सावमधम्मुविससंदसिउगुण वितणमनिमलवातहिंगरयारुणिवारिराजश्णापत्यारिखलानिदिहश्रसिधाराकरवन्नहि विजाइनिविपरवाइसजणु पहकामराडपसरमणुलो विमानकलनमनि अणजयलुवलश्कयोहर पण्यारिटहासोखकहिकहनजार अवलोकमष्टछाक विलामनियकायचुक्क संकालुदततामुखक्कमयमुडणु विलनिबंधणु कुखरारोहणुनासाखंडणुजारुहो तिडायणा. अपससमुन्घुण्ड्रहरडण्उंसलामरिसिवयणाई खणतिमय गंधारितणताहाहामउंडहण्डहुकिझ्यानि यहियाविषय मणिधिमुणिवस्वविषयहश्मदालणि हियपायकंदाहऽ कंतागुरुवयणचितमिण नग्यविवरनिधडपासकंतिए कंतदासईअहिमाण विणासन कहि कुवेरकतहिलासलहउँपाविधिहचहदायमादोजउतिसमझमईही सुगमगर जामिदवपाधाहे जनहदश्वदिप्मुससमाहामाजपईपरमलमंलिङ तालोमजलपरकालिन ६ घत्ता-इस प्रकार मुनि के उपदेशों को सुनते हुए विद्याधरी का मन सन्तप्त हो उठता है। हा-हा, मुझ अपनी पत्नी के साथ विहार करते हुए उत्पलखेड के बाहरी आकाश में जाते हुए उसका विमान स्खलित दुष्टा ने दुष्ट काम किया।' वह अपने मन में विचार करती है ।।१४।। हो गया। उसने उपवन में मुनि को देखा। दोनों ने भावपूर्वक उनकी वन्दना की। पूछे जाने पर मुनि ने धर्म का कथन किया। श्रावक-मार्ग का विशेष रूप से उपदेश दिया। गुणवान् और पवित्र वचनवाले उन मुनि ने १५ परस्त्री-सेवन का विशेष रूप से निवारण किया कि परस्त्री-सेवन करनेवाले की लोक द्वारा निन्दा की जाती मुनिवर का मान कर, आकाशतल में अपने चरणकमल रखते हुए वे दोनों भी चल दिये। मुनि के वचनों है, असिधारा और करपत्र से उसका छेदन किया जाता है। उसकी तृप्ति नहीं होती और सज्जन सन्तप्त होता का विचार करती हुई और नरक-पतन से डरती हुई कान्ता विद्याधरी ने अपने अभिमान को खण्डित करनेवाली है। कामदाह बढ़ता है । मन फैलता है। स्नेह करनेवाले दोनों नेत्र जलते हैं । परस्त्री-सेवन करनेवाले को सुख । कुबेरकान्त से सम्बन्धित अभिलाषा ( पति को) बता दी और बोली -"मैं पापात्मा तुम से विद्रोह करनेवाली कहाँ ? यद्यपि लोक अपने कार्य की आलोचना करता है, परन्तु शंका करनेवाले को उससे भी दुःख होता हूँ। मेरी जैसी स्त्री संसार में न हो, हे प्रिय, मुझे छोड़िए, मैं प्रव्रज्या के लिए जाती हूँ।" तब पति अपनी है। सिर का मुण्डन, (बिल्लणि बन्धन) खोटे गधे पर आरोहण, नासिका का खण्डन, इस प्रकार तीनों लोक पत्नी के लिए उत्तर देता है-"जो तुम्हारा मन दूसरे के प्रेमरूपी मल से मैला था वह आलोचनारूपी जल में जार अप्रशंसनीय होता है। मरने पर पुन:दुर्भग, दुष्ट, नपुंसक होता है। से प्रक्षालित हो गया। Jain Education International For Private & Personal use only ____www.jane57yorg
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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