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________________ धना रसि रामअकंपपुराणासुप्पह सालंकाराणवरकश्कहा। मधेस्वरसेतीक बसेसयसमिसुमुहहं सहसुसुगाहहमंगलयमहहस चपराळाकमंत्री सुलोचनाकीवातील समिगलोयणताहसलायण ललहावश्सुहसायणा जहबकाशकिरसीसउवमापजनहिकिपिमदासच्या यङ्ककाईकमलुसमुसणियडे तरकालंगुस्करक्षिणानुणि यासिकाईवासरकहिमिनदिहकमाणहपहादगणहश नारुविंदनणुविधाजश्रलहोणासनकरुदानहरुडमलहोजोसमुलणश्साकर पडियउलतिद बन्नामिकानियवास्तषु जहिपतउतियणविलकत्राणु समउसमन साखनष्ठणादिहेसरिसणसलिलावा कहियजयखचितगला लासश्कण मकलिसकर्हिकश्यप दद्दालाईदासिसिमडणुचाम्ससहरुसमलुसखंडण विसरूषा वाणहोउवभिजलासुसरिहाउसंजित्तगिजर जिवचारहायवनसवाणशमियुपतम्या बलायजापाई किसारंगणमणसाउना कित्रितविजछत्तयडला पारखहलनविजाकेसराश तामताहगिरुवमश्वरगरलालदालणकालणडनश्छुड्जवसंतमाससंपन्नापत्ता किरिया २० उसमें राजा अकम्पन, रानी सुप्रभा है। अलंकरों से युक्त वह ऐसी लगती है मानो वर (श्रेष्ठ) कवि की कथा हो। खिले हुए कमलों के समान मुखवाले हेमांगद प्रमुख उसके एक हजार पुत्र हैं। उनकी बहन मृगनयनी उसके उन नितम्बों के भारीपन का क्या वर्णन करूँ कि जहाँ त्रिभुवन छोटा पड़ जाता है । जलावर्त (भैंबर) सुलोचना है। और छोटी सुखभाजन लक्ष्मीवती। उनमें से बड़ी के रूप का क्या वर्णन किया जाये कि जिसके उसकी नाभि के समान नहीं है, लोगों के द्वारा उसका बूम बूमकर भोग किया जाता है। चित्त की गति को लिए कोई उपमान ही नहीं दिखाई देता। पैरों को कमल के समान क्यों कहा गया ? वह क्षणभंगुर होता है, रोकनेवाला स्तनबुगल कहाँ ! और कहाँ कविगण उसे स्वर्णकलश बताता है ! एक तो वे (स्वर्णकलश) कवि ने इसका विचार ही नहीं किया। नक्षत्र दिन में कहीं भी दिखाई नहीं देते, मानो जैसे वे उस कन्या के आग में तपाये जाते हैं, और दूसरे उनसे दासी के शिर का मण्डन किया जाता है । खण्ड और कलंक-सहित नखों की प्रभा से नष्ट हो गये। चन्द्रमा अच्छा, परन्तु उससे युवती के मुख की उपमा क्यों की जाती है ? उसके समान तो उसी को कहा घत्ता-जो कवि छोटे से शंख को जंघायुगल के तथा हाथी की क्षणभंगुर सूड को ऊरुयुगल के समान जाना चाहिए। जिस प्रकार कुमारी का हृदय प्रकट होता है, वैसा अवलोकन मृग नहीं जानता। फिर उसे बताता है वह भ्रान्ति में पड़ा हुआ है ।। १२ ।। मगनयनी क्यों कहा गया ? कितनी उक्ति-प्रतिउक्ति दी जाये! नख से लेकर केशों के अग्रभाग तक उसके जितनं उत्तम अंग हैं वे निरुपम हैं । इतने में शीघ्र बसन्त मास में लीलादोलन और कीड़ा की युक्तियाँ आ गयीं। Jain Education Internations For Private & Personal use only wmja-513
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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