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________________ जशपंगुलुगुलुकेवलपिजापविजाइयमद्धकलउन्ना पापियामपंकजति धनार्तता डिमसालेपरियणण उबलदिदंडसहास कीतदेहतारणसक्क साधकाणासासेंणसुखमय। नागकुमारूदेवमे मुफपिवयधारहरडसावणानकमार सायणि घेखप्रतिपूर्वत वर्वानीकथन। हसमपरिणामें सुरसरिदेवयकालागामें विसिविमिलिया दियवाधरियल उडवबसिउसहरियायनयतजाब, किरमारमि भासविवलयलुबियारमि सामग्जामिनट साहिल चरमदेडसालेणपसाहिड़ एमलप्पियुतणपणासे समजखुसचियरासयासें हिमश्मदिखईपरिहाणशादि मईसपाध्यसमाग अवसरसरसुलणविगळतेवदेव विविधरणि खजनहेपिसपिदिवसासवसंपयक्ष जगजावोधमजलूमणतका विहसविकरुणाहेंवालिय सरदयसादियमहियला देववितदीपायपिडहि फरमासु धम्ममनिचला। इसजगणकहसाहिबजावर्हि अवरुविमंतिपराश्यतावहिंगाबालविटामा चिवहारं सोराबहादावियटिहारे तणपनवर्णिमणिणिववरससि कासाविसपनयरिवाणा तुम्हें पंगुल पंगुल ( पंश्चली-पुंश्चलो) क्या कहना चाहिए था? तुमने जन्म से अनुरक्त मेरी कुल पुत्री को करकमल के कमल के द्वारा जो ताडित किया था पत्ता-उसे समस्त परिजनों ने पत्थरों और हजारों दण्डों से गिरा दिया। काँपती हुई देहवाली वह, अपने यार के साथ साँस से मुक्त हो गयी ॥१०॥ हो। यह कहकर समता के जल से अपनी क्रोधाग्नि शान्त करते हुए उस नागेश ने मुझे दिव्य परिधान दिये और असामान्य आभूषण दिये। उस अवसर पर अत्यन्त सरस बोलकर वह वहाँ गया जहाँ नागराज बिल में उसका भवन था। हे देव सुनिए, जीव का संसार में धर्म ही शाश्वत सम्पत्ति करनेवाला आधारभूत वृक्ष है। घत्ता-कुरुनाथ ने हँसकर कहा कि जिसकी धर्म में निश्चल मति (या निश्चल धर्ममति) होती हैहै देव, भरत के समान धरती को सिद्ध करनेवाले भी उसके चरणों में पड़ते हैं ॥११॥ व्रत धारण करनेवाला नाग पहले ही मर गया और में भवनवासी नागकुमार हुआ और वह नागिन समपरिणाम से गंगा में काली नाम को देवता हुई है। हम दोनों भी मिल गये और तुम्हारी उस कुचेष्टा को याद कर उसे मन में धारण कर लिया। मैं यहाँ आया और जबतक मैं तुम्हें मार्स और कद्ध होकर तुम्हारे वक्षस्थल को फाड़ दूं कि इतने में मैंने जान लिया कि तम पुण्यशाली हो, चरमशरीरी और शोल से प्रसाधित इस प्रकार जैसे ही जयकुमार ने कहानी कहो कि वैसे ही दूसरा मन्त्री वहाँ आ पहुँचा। जिसकी गर्दन में मोती का हार लटक रहा है ऐसे प्रतिहार ने राजा से उसकी भेंट करायी। उसने कहा-हे नृपवर ऋषि, मुनिए, काशी देश में वाराणसी नगरी है। Jain Education International For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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