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________________ एशेपूवरपसंडापिंडहिंपीपाश्यग्रहापाविससमिक्चश्वरसईदविदारेशमक्षमएमझापा उपश्सविनियसगरूरूसपदिविसवि वालाचालियचामरमाला अहश्काश्यपळिवलालय पुषचन्नखुदमिदमोहिए गमकालगस्प्रासंहिगावना संयमयखषतिजएपहरे जाणियचा डियाधाएं पङ्ग्रहश्चारधिलासिणिहि सहकालापविणायारामहियगयलालएपउढान्नपूर्ण अंतररूसमिनिपलाइनखणेसंसहावमपर्मत नझुमचिकितनुचिता जाणश्अपठेवाप विनिवियनारयणायाणऊनिवि पुणधवलोमविपिडपयारपहरणलवणहंडागारख पुण्यरुपसहमहदेपासचम्मसलसिदेशविणासइकामसञ्चवलायजावदि कामुक्तिहे श्रासकरवाचदि हल्लिसहितरिणिमा आउदउधएवढाधिराजाश्ससउपसमूदनिमित्र शंपारणारीलकणशवचितई उमजतणजिसजाइछसहसजिसजनमानधनाजसुजा सदियतस्पिरिलमर्श समिकरणियरलपासतहोसरहासरिसमहानिवजगणनडाचवणदो समसारमादिरादसामतई मंडालयहमहिमाश्मदतह पकहिदिणधारहनिरवायहं बरकर खनवित्रिवडरायद कुलमईअप्पलपलपरिपालण अवरुसमंजसलामलखाला णिसुपादन अवलरियकरिंदह पचलेठचारिशुपरिदह जगवरेवितटागरिखरकंदरे अनियतिवारहसवारपट प्रवर स्वर्णपिण्डों से प्रसन्न करता है, फिर दरबार को विसर्जित करने की इच्छा करता है, और घर में स्वच्छन्द विहार से रहता है। मध्याह्न में स्नान के लिए प्रवेशकर अपने शरीर को भूषणों से सजाकर, जिसमें बालाओं के द्वारा संचालित है चमर ऐसी किसी राजलीला से रहता है। भोजन करने के उपरान्त राजा नृपगोष्ठी में अत्यन्त सन्तुष्टि के साथ अपना समय बिताता है। __घत्ता-घण्टी के आघात से जाने गये तीसरे प्रहर का एक क्षण बीतने पर राजा विलासिनियों के साथ क्रीड़ा-विनोद करता हुआ रहता है ॥३॥ का अवलोकन करता है उस समय काम भी उससे आशंका करने लगता है। वह हस्तिशास्त्र और अश्वशास्त्र को नहीं छोड़ता, आयुर्वेद और धनुर्वेद को भी समझता है। ज्योतिष, शकुन-समूह और निमित्त शास्त्र को भी जानता है। नर-नारियों के विचित्र लक्षणों को समझता है। तन्त्र और मन्त्र का संयोग तो उसी ने किया। भरत ने स्वयं भरतसंगीत को उत्पन्न किया। घत्ता-जिसका यश दिशाओं में घूमता है, और चन्द्रमा के किरणसमूह का पोषण करता है। उस राजा भरत के समान महान् राजा जग में न तो हुआ है और न होगा॥४॥ राजा गजलीला से अपने पैर रखता है, और फिर घूमकर अन्त:पुर देखता है । एक क्षण में अपने स्वभाव से मन्त्र का विचार करता है। यह वस्तु छह गुणवाली है या नहीं, यह विचार करता है। वह अपने को और एक दिन राजाधिराज वह, महिमादि से महान् सामन्तों, माण्डलीक राजाओं, धीर और अपायरहित बहुतवर्णों की प्रवृत्तियों को जानता है। वह कृष्यादि वार्ताओं के आचरण और न्याय तथा अन्याय की उक्ति को से राजाओं से क्षात्रधर्म का कथन करता है-कुलमति अपना और प्रजा का परिपालन भी मल को दूर जानता है। फिर वह विविध प्रकार के आयुधभवन और भांडागारों का अवलोकन करता है। फिर वह गुरुजनों करनेवाला सामंजस्य (करना चाहिए) सुनिए, अपने बाहुबल से गजराजों को तोलनेवाले राजाओं के चारित्र्य के सभामण्डप में प्रवेश करता है, तथा धर्म और शास्त्र के सन्देह को दूर करता है । जिस समय वह कामशास्त्र के पाँच भेद हैं। जिससे गिरिगुफा में तप का आचरण कर, जिनने पूर्वभव में तीर्थकर प्रकृति का अर्जन किया। Jain Education International For Private & Personal use only www.jan5070rg
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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