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________________ धम्मुकरशहरडसह लावलिगिहाराविनरसह चिंतश्चनदहलवियकरुगोसयाहगोडबजेपिर पारीसहसंदाकरमिजरवारासनसनदंपसउल्लन दलकहमडएकुरडलन गरखादंपडि वहमलडीहरिहरिखाहकरिविकरिबपासायहोविमझसयणामलालपरसुजणिजधरणा यख जविपन्जापासंगान चिंतितउसयलपरायताविजाउखजशास्तविणविणासिस ताविपद्धतेचक कालवकहोकिरकर छत्रेहमरंजीवनपरकश् दंडुक्कगदडणुदरिसावशमणि सादामणिणसुमपावर असिमसिमन्नडलसहकारणचामुकयतडहरखधारण कागणिखणणा होडहलादह बहारिसहधरित्तिसमाह होउहोउरायवदागर्थे हमुणिवरूवखदिनक्छांच्या पुदिषुश्मझायंतहोकयरुज उडेविययनितिपरमाणुयापूला सिढिलाश्हातिसरही पिया ममणमलपुर निवर्डतिभातिवाणीअलए करककपकरशाशरायणार्कितासकझिजश जासमअरिमरहिमसिजार जासुखसुरणकोविणकहर जासुपयाउदिसतेपवहरजोयापपरम पपुजेवि मंगलमवच्छश्यडिवनविणासासणेदिउन्नयतइ समलनयमविनिमसंचितच दिशारिश्रणिठण्युनिज निवर्ससासपद्यपाहिजइकदिसणहालारणहसियहि सम्माणाही लोयअहिलसियदि दविणावाश्युरिसुसंहावरंचरपरमंडलपहावश्सनलकलाकसलविसम्मा भरतेश्वर जिनवर धर्म का आचरण करता है। वह भावलिंगी होकर, शरीर की चिन्ता छोड़कर हाथ लम्बे के) रागपरमाणु धूलि के समान उड़कर जाने लगते हैं। कर (कायोत्सर्ग कर) विचार करता है - "सैकड़ों गायों में एक गाय का ही दूध पिया जाता है, हजारों घत्ता-इस प्रकार राजेश्वर के निकलते हुए मनोमल से पूरित करकंगन और केयूर आभूषण शीघ्र ही स्त्रियों में से एक ही स्त्री से रमण किया जाता है, सैकड़ों खारीभर (मापविशेष) भात में से अंजुली-भर धरती पर गिरने लगते हैं ॥२॥ चावल खाया जाता है। लाखों रथों में मेरा एक रथ है। मनुष्य बड़े मनुष्यों का प्रतिबद्ध (दास) है, अश्व अश्ववाहों का, और हाथी हाथियों का। प्रासादों के भीतर भी शयनतल होता है। लो, इस प्रकार धरिणीतल का भोग किया जाता है। तब भी जीव राज्यत्व से क्षय को प्राप्त होता है; वह क्षणभंगुर और बहुत सन्तापकारी राजनीति-विज्ञान उसी का कहा जा सकता है जिसके मन्त्र का भेदन शत्रुमनुष्यों के द्वारा न किया जा है। चक्र क्या कालचक्र से बचा सकता है, क्या वह छत्र से ढके हुए जीव की नहीं देखता? दण्ड कुगति सके। जिसकी तलवार से युद्ध में कोई नहीं बचता, जिसका प्रताप दिशाओं में फैलता है, जो सवेरे परमात्मा के दण्ड को दरसाता है, मणि आकाश से च्युत बिजली की तरह है। असि (तलवार) कृष्ण उद्भट लेश्या की पूजा कर, मंगलवस्त्र पहनकर न्याय-शासन में अपना मन लगाता है, समस्त प्रजा-वृत्तियों की चिन्ता करता का कारण है, सेना यम के नगाड़ों के शब्द को धारण करनेवाली है। दुःखों से आलिंगित धरती को इच्छा है, अधिकारियों को अपने नियोग में लगाता है, राजा सम्भाषण और दान से रंजित करता है। वह स्नेहपूर्ण करनेवाले हम-जैसे लोगों के पास काकी मणि क्षण-भर के लिए शोभित होता है। राज्यत्व और परिग्रह अवलोकन हँसी से, सम्मानित लोक अभिलाषाओं और धन के उपाय से कितने लोगों का आदर करता है, रहे । मैं मुनि (के समान) हूँ, केवल वस्त्रों से घिरा हुआ हूँ । प्रतिदिन इस प्रकार ध्यान करते हुए उसके ( भरत शत्रुमण्डल में चरों को भेजता है, www.jainelibrary.org Jain Education mematon For Private & Personal Use Only
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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