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________________ पारसलालसुमासकणावलुछ परिक्षावमाणुसम्मुहमुदुसरिदिउलविमलजलेकीलमाए धाव गलगलिगमाणु संगोयगारिगयश्चिनसोणपरकश्सामुडसरंच एउपेरुविसया साएदमिल चदिसावखरावदमिन पासपाझ्याणणिहणवणवाहविरहारणामडणु। पवसिदा महिलमुलमसिहण तितितिडिदातडिक्कारखणिहा ककेबिक्रसमसमवप्पएणदार अलवदेहलिदिन्नपण वयरपटगहनेण तासिउसावरदावराण गमवकर्यतापपेपर्डति माहंधसयलसहिखयहाति पक्ककिदियवसमुनगयाई गवडकुजहिजवटाई असस्लिप चखासामिसाई चक्रियपंचरकरसामिसाह केधावियदसदिसर्वसाई अस्कमितक्अिम्हारिस साहाला दासलरेतिमणेत्राइमरवणे अमियतेमनिवसंसिठातेणसमायण जाण्यपण जगणमिणमिठाराण्णसारखालाकमारधारधराणसासाराधार कलिकखया कृतवान्वहण सासमिकपियसयमह बडदाखवलकामसरहोरखं नाचवतपाठ सोमयरविधामपणेवटपरमामरण समणिलरुचवालदिवायरणे कामिणिमेणिवजगकरा मापसमाजमिकेमुताय पनपकाखवखुरामा छारलुलामयडराउजिहलळा तिहqडरा प्रासश्रमवास्सिएंडरीठ मसतण्ठतपठसोडराज श्दकउजुनिवडरीउद। पटरवहण समणिलरावणारिखलाखयधडराउाएET रस का लोभी मांसकणों का लोलुप सामने दौड़ता हुआ मूर्ख मीन नदी के विपुल जल में क्रीड़ा करता हुआ घत्ता-अपने मन में इस प्रकार विचार कर उसने एक पल में राजाओं से प्रशंसनीय अमिततेज को धीवर के काँटे से गले में फंसा लिया जाता है, गाती हुई गोरी अपना चित्त और कान लगाये हुए हरिण नहीं बुलाया। आये हुए उस युवराज ने अपने पिता को सिर से नमस्कार किया॥५॥ देखता सामने आता हुआ तीर, विषयों की आशा से दमित हरिण का जोड़ा खेत के चारों ओर घिरे हुए बागर को नहीं देखता, और प्राय: बन में व्याध के द्वारा विद्ध होकर निधन को प्राप्त करता है। जिसकी शिखा प्रोषित- राजा बोला- "हे कुमार, धुरी उठाने में धीर तुम धरती का भार उठाओ। मैं सैकड़ों पापों को कैंपानेवाली पतिकाओं के आँसुओं से आहत है, जो तिड़-तिड़-तिड़की ध्वनि से मुक्त है, जो कोरण्टक पुष्प के समान तप की आग से कलियुग के पाप के कलंक को शोषित करता हूँ। तुम कुल-परम्परा के भार को अपना कन्धा पीले रंगवाला है, देहली पर रखे हुए, तथा रूप में लीन शलभों का क्षय करनेवाले दीपक के द्वारा कहा गया दो।" तब वह कामध्वजी पुत्र उत्तर देता है- "मैं परमादर के साथ इसको नष्ट करता हूँ, उसी प्रकार जिस उसे अच्छा नहीं लगता, इस प्रकार सभी यम के मुंह में पड़ते हैं। हे सखी, सभी मोहान्ध क्षय को प्राप्त होते प्रकार बालसूर्य के द्वारा अन्धकारसमूह नष्ट कर दिया जाता है। हे विश्व के एकमात्र सम्राट्, आपके द्वारा हैं। एक-एक इन्द्रियों के वश में होनेवाले जीवों को जब इतना बड़ा दुःख है, तब पाँच अक्षरों के स्वामी भोगी गयो भूमि और धरती का उपभोग मैं कैसे करूँगा! आपके चरणकमल की धूल का भ्रमर, क्रूर शत्रुरूपी (अरहन्तादि) का स्मरण नहीं करनेवाले, तथा पाँच इन्द्रियों का स्वाद चखनेवाले तथा दसों दिशाओं के पथों लक्ष्मी के लिए व्याघ्र, में। जिस प्रकार लक्ष्मीधर है उसी प्रकार पुण्डरीक है। इसलिए अपने पुण्डरीक को और धरती को कैंपानेवाले हम लोगों के दुःखों को कहने से क्या ? आसन दे दीजिए। वह पुण्डरीक मेरा पुत्र है। For Private & Personal use only www.jainelibrary.org Jain Education Internation
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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