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________________ कलवासाहोहथिरुघणर्सकासकामु मलणेवितणयरनरडलंघुचलसिरिहसमापिलव जलंघसदस्यसपहिसावमुरहिं अवरहिंमिराबाहिथिरखा वववचक्रव पहिनिणक्षिक्षकलक्षिकउकामारक तपासासतपरमसारखार लिकमलुन्त छाहायसरसंदरीह पत्रहविपुंडरिकणिमुराठाघहाजासा वदेविकस्विसम्मत चकवश्सवहर अश्मकलिहमापि तानिसिमिडियद लसुरहिनकमलाळवणवालेंाणिराजाश्मननादलविण लिप कोकिरणशियगोमिणिहलवण भग्वारस्तंसारमणराशा ललीमुहदसणकामुपाश्र्तवारवारचप्पविकरण विहडिमड़ेकर मलुसरणतण युणवणुलालाकालतगण एककुपवत्रवर्णतण विठगएखदहणायु खरद डणासतदागुपचिसस ववगनमलदलवलीताले अवलोइलिकेसररयाले सरस्टकरडे निम्मकनार दणालमाणिनियाविराट सासश्मामिसिलामहण करिकाणटपाणसदि। याण बापलेकवालघुलतएण संपचालकाडतपणाना दिसहिंसमुल्लसझलोलवलशस ठिकहिंपसरश्करुणिसितमपिहियमुह एवं सुरुधिलोलुमुउमङमाथा आरोहणताडणर बधणाई कुसखायाईकयवयपाउंगणियारिफासनसमागरण सकिसविडनिसदिनगए रश्च जीवन-धन-पुत्र-कलत्र और घर मेघ के समान किसके पास स्थिर रहते हैं ? यह सोचकर उसने शत्रुनर के एक-एक पत्ता तोड़ते हुए राजा ने उस कमल को चाहा। खर को दण्ड से नाश करना उसका (राजा का) लिए अलंघ्य वज्रजंघ के लिए कुलश्री साँप दी। और अपने बहुत-से बहुश्रुत पुत्र-पुत्रों और दूसरे भी स्थिर गुण-विशेष था। मैले पत्तों का समूह जिसके अन्तराल से हट गया है, ऐसी कमलरूपी मंजूषा में परागरज भुजाबाले राजाओं के साथ उसने जिनदीक्षा ले ली। उसने कर्मों से मोक्ष पाकर परम सुख प्राप्त कर लिया। में लीन एक निर्जीव भ्रमर उसने देखा, जैसे इन्द्रनील मणि हो। उसे देखकर राजा कहता है-हे सखी, देखो यहाँ भी जिसकी गलियों में सुर-सुन्दरियाँ भ्रमण करती हैं ऐसी पुण्डरीकिणी नगरी में इस भ्रमर ने हाथियों के कानों के आघातों को सहा है, मदजल से गीले कपोलों पर घूमते हुए और गुनगुनाते घत्ता-शुभ में प्रेम को निबद्ध करनेवाला वह राजा चक्रवर्ती रह रहा था, तब रात्रि के समय एक मुकुलित हुए यह दुःख को प्राप्त हुआ है। दलवाला सुरभित कमल उद्यानपाल ने लाकर दिया॥३॥ घत्ता-यह दिशाओं में उल्लसित होकर चलता है, मुड़ता है, रुद्ध होने पर अपने कर कहाँ फैला पाता है? लेकिन रात्रि में अन्धकार से ढंके हुए इस कमल में गन्धलोलुप यह भ्रमर मर गया॥४॥ उस कमल को लेकर राजा ने देखा। लक्ष्मी (शोभा) के घर को कौन नहीं देखता? क्रीडानुरागी वह राजा उस फूल को खोलता है, जैसे काम लक्ष्मी का मुंह देखने के लिए (उत्सुक हो); बार-बार अपने हाथ __'आरोहण-बन्धन-ताड़न' और बेदना उत्पन्न करनेवाले अंकुशों के आघात, और हथिनी के स्पर्श के से चाँपकर उस वीर ने उस कमल को मसल दिया। फिर बार-बार क्रीड़ा के साथ उससे खेलते हुए उसका वशीभूत होकर आता हुआ हाथी, बताओ कौन-सा दुःख सहन नहीं करता! Jain Education Internationa For Private & Personal use only www.jan467.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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