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________________ विदाङउत्तण यकम्मार कश्याएरम्माणाजिणणाहयाय दिलाएझाए सुश्सायकसहि घरुपडिएखलदिरू प्पमयकडाहाबाहयस दिविप्फुरियरयणहिवरदारगढद्रियासणविराड्याहामाणका वश्यहिं पडिनन्नपळश्टकंतीविध खतमासियहि मदतपतियादिविसंतपूड़िहाशदि। हाखददेशयाणापयाहि णापााइवाहिकलमडवातावासम्माजजात्रामलियासहियण। दि सरिणहितारणहि घणखगहारहिं पहपहिवरहिं पति वाघुश्रीमती तरूणाहि मंडलियधरिणीहि खयदिजारकणिहिनामराणि सविणिहि हिमहारसरिसहि सजलेहिकलसहि परसन्नवता हिंसोहमसंदरई हवियाबडवईयुषपणुपसाहिमाण वरयादियथुखक्षणकलयलचिवलेदिमंगलर्दि एप्पुजेगाझ्याशासम्मलाग्यशाधना पसरियकरहेममा निझमयमयणेसवियारित मुहबडुपियहणंगयघडदेव रखहडेउसाहिरिशसोहणेवासरेवालमुग्नमे उपदोहाडकावलानिमम पाणिणापाणिताए। तिणामरि गडाहोपरंहसहोहारिम रायराएपर्सिगारगणाणिनीताश्णेयस्सपिनकरेपणिय कर्मों का क्षय करनेवाले जिननाथ की पूजा की और धूप दी। पवित्र स्वर्ण-घटों, सघन निर्मित खम्भों, किया गया। पास पास बैठे हुए उनके स्तुति शब्दों की कलकल ध्वनि से पूर्ण धवल मंगल गीतों के साथ रजतनिर्मित दीवालों, अलिखित भांडों, चमकते हुए रत्नों तथा श्रेष्ठ हीरों से सघन आसन से शोभित वेदियों बार-बार गीत गाये गये। और कान्ति से अलंकृत शत्रुओं की आँखों को आच्छादित करनेवाला, चमकते हुए मोतियों के समान अपने पत्ता-जो मद से परिपूर्ण है, तथा जिसके हाथ फैले हुए हैं ऐसी प्रिया का काम से विदारित मन उसने दाँतों की पंक्ति से जो हँसता हुआ जान पड़ता है और दृष्टिसुख देता है। नाना परकोटी, नाना द्वारों से युक्त मुखपट को हटा दिया मानो वरसुभट ने गजघटा का मुखपट हटा दिया हो॥१२॥ इतना बड़ा मण्डप बनाया गया कि जहाँ तक सम्भव है उसमें जनसमूह समा सके। एकत्रित सुधीजनों, निबद्ध तोरणों, मेघध्वनि के समान गम्भीर बजते हुए तूर्यों, नृत्य करती हुई तरुणियों, मण्डलाकार गृहिणियों, जिसमें उग्र दुर्भाग्य और दुःखावली का अन्त हो गया है ऐसी शुभ लग्नवाले सुन्दर दिन, उसने उस स्त्री विद्याधरियों, यक्षिणियों, नागरवनिताओं, हिमहार के समान जलमय कलशों और पति-पुत्रोंवाली राजमहिषियों । के हाथ को अपने हाथ में ले लिया। और उसकी असह्य कामपीड़ा को शान्त कर दिया। राजराजेश्वर ने भिंगार के द्वारा, सौभाग्य से सुन्दर वधू-वर को स्नान करवाया गया। उनका नवरति रस से अत्यन्त परिपूर्ण प्रसाधन से लाये गये पानी को भानजे के हाथ पर डाल दिया (और कहा), Jain Education International For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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