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________________ प्रमणियमहाकवामिलामियाधानहोणामवानीसमापरिछउसमनाक्षाशाळायलिटलको लापमसमछतिभखनिकर्सवकर्मिको सुरपतिमुकटकोटिमाणिकामधुव्रतचञ्चविताविलसदगुचता पनिर्मलजलजन्मविलासिकोमल घटायचमंगला निसरतेवरतबनिनपादपंकजी वर्क तणिस पविषडकरयलेकरवि गटापंडियाजणगेदो अश्कृडिलमुत्तममणाहयि चंदलेहर्णमेदहाड़बड़ एनहिंसानारिंदयविसहमिमममविरहदेमणु पाइपडियाययविलाउ परमययनिहेलपा लापवणयधयमालाचवलं हिमवंदसमाणसुदाधवल गायणगणमान्दाजिणधवल सिईतयदा णकलयालमुहाल गरयंगपालममहासिहर असंदचंदकररासिहर जाकंदमरिकयडिमानिलया। विदुमतलनसयतलासिलयामरायममरंवलसमुहरिया मणिमन्त्रचारपालकरिय प्राथासफलिस यत्तित्रयल हरिणीलपिबवटरेनियलं नाश्यमभंगारवर सुमुगुमुगुमतमन्नालिस घल्लिययप्फुल्लियफुल्लचर्य लिवियमनियदामसमयसिपिणतंमणिणाघरं णविजयनियाजियजम्माजरायडुविउसिययसरिविदावि या मायरनरहियरितावियाघना। यदसदिसिवनसमछलिया नायडवश्यरुजाण धरणीसरतण यदेसिरिमरहि सोयलजुयलउभा05/5वविविहाहरणकरणविष्फुरियामाहाभियफणिवरेस सन्धि २३ जो मरकतमणियों के खम्भों पर आधारित है, मणिमय मत्तराजों से अलंकृत है। जिसका भित्तितल आकाश यह सुनकर चित्रपट को हाथ में लेकर वह धाय जिन मन्दिर के लिए गयी। मानो अतिकुटिल, तेजवाली के स्फटिक मणियों से निर्मित है और भूमितल हरे और नील मणियों से रचित है। जहाँ अंगारवर में धूप और सुन्दर चन्द्रलेखा मेघ के लिए निकली हो। खेई जा रही है, जिसमें गुनगुनाते हुए भ्रमरों का स्वर हो रहा है, जहाँ चढ़ाये गये पुष्पित पुष्पों का समूह है, जहाँ सैकड़ों मोतियों की मालाएँ लटक रही हैं, ऐसे मुनिनाथ के उस घर में प्रवेश कर जन्म-जरा को जीतनेवाले जिन को नमस्कार कर, उस धाय ने चित्रपट को फैलाकर दिखाया। नागर-नरों को वह बहुत विचार यहाँ वह राजपुत्री प्रियतम की विरहवेदना सहन करती है, और वहाँ पण्डिता धाय ने जिनमन्दिर के दर्शन किया। किये। जो पवन से उड़ती हुई ध्वजमाला से चपल तथा हिम और कुन्द पुष्प के समान सुधा से धवल था। घत्ता-इस प्रकार दशों दिशाओं में यह बात फैल गयी। जो चित्रपट के वृत्तान्त को जानता है वह श्रीमती जिसमें गायक-समूह द्वारा जिन भगवान् के धवलगीत गाये जा रहे हैं, जो सिद्धान्तों के पठन के कल-कल के स्तनयुगल को मानेगा (आनन्द लेगा) ॥१॥ शब्द से मुखर है, जिसके शिखर आकाश प्रांगण को छूते हैं, जो अत्यन्त विशाल चन्द्रमा की किरण राशि को धारण करता है, जो यक्षों और यक्षिणियों की प्रतिमाओं का घर है, जहाँ तलशिला विद्रुमों से रचित है। विविध आभरणों की किरणों के विस्फुरण से नागों और देवेन्द्रों को तिरस्कृत करनेवाले For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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