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________________ यमा नरपचियपीगपठहरह चालीससमध्यवरछरदाणकनकविसंकासणही महाविसर्वप हकण्यपहाचिरलवपरियालियरहवाकपायललसुहाासापावकलयसोपयहिसका साहसद्धवसहएक्कपरकासम्समज्ञाहावासहसाउथउपरमाउजलाहमाणावहारियय पासाजीव राकसजमावारिससहासलारियाणाशासायापउन्नससमायनसहा कारिणकपसमिल्लियाम्तहायलपकनाठसधाणायामाळरपाणपावरणिया कालण चिरतणअवहरिय अपक्कसर्यपहथनयरियातयहरूलएकामणरसुतहिहिहिसिया त्रणेणियाजसुतहणाहिदासी गदिस्त्रण तहसम्हाडराकृडिल तणन तहणजयलयकतिण शणउत्तपनिसमाहिदअण्पण वामदरकदरकालियवतरऊ इलसजगहिगुहाविवरातहत पवियागदिवसातदोललि! बगहारमणवसाघलासरहा दिव निसुणिमहाणिवारिसिहि पुराणाहवरितागएकालपथ असरालग घुप्पयताश्ससार। यरियालासमहापुराणात सहिमहापुरिसगुणालंकाराम।। होकयुरफयतविरंध्यामहार उर से अपने पीन स्तनों को प्रेरित करनेवाली चालीस सौ अप्सराएँ उसके पास थीं। नक्षत्रों को कान्ति के उसकी दोनों भौंहों में कुटिलता, स्तनयुगलों में कठिनता, इस प्रकार अपने को स्थापित कर लिया। जिसमें समान नखोंवाली महादेवी स्वयंप्रभा और कनकप्रभा थीं। पूर्वभव में शुद्धब्रतों का पालन करनेवाली विद्याधर क्रीड़ा करते हैं, ऐसी मन्दिर की गुफाओं, कुण्डलगिरि के विवर में, उस ललितांग देव के रतिक्रीड़ा कनकलता, सुभाषिणी और विद्युल्लता। वह इनके साथ सुख से वहाँ रहता है, और एक पक्ष में साँस लेता और शारीरिक भोग में दिन बीत गये। है। पत्ता-गौतम गणधर कहते हैं कि हे श्रेणिक महानृप, सुनो पुराने ऋषियों द्वारा कहे गये पुराण को बहुत घत्ता-शुभस्वादवाला श्रेष्ठ एक सागर की श्रेष्ठ आयुवाला। एक हजार वर्ष बीतने पर एक बार खाता समय बीत जाने पर, पुष्पदन्त तीर्थकर की गति याद आती है ॥१५॥ है और जीवित रहता है॥१४॥ इस प्रकार त्रेसठ महापुरुषों के गुण-अलंकारों से युक्त वह सात हाथ ऊँचा। शुभ करनेवाला वह किसके द्वारा नहीं चाहा गया।? उसकी एक पल्य आयुवाली महापुराण में महाकवि पुष्पदन्त द्वारा विरचित और महाभव्य भरत द्वारा पत्नी है जो बेल के समान पीन स्तनोंवाली है, जो बहुत समय के बाद उसे मिली, एक और स्वयंप्रभा अवतरित अनुमत महाकाव्य का महासंन्यास मरण और ललितांग-उत्पत्ति हुई। कामदेव ने उसके ओठों में रस, दृष्टि की श्वेतता में अपना यश, उसके नाभिदेश में अपनी गम्भीरता, नाम का इक्कीसवाँ परिच्छेद समाप्त हुआ॥२१॥ Jain Education International For Private & Personal use only १५ www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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