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________________ मासुमहतधतविलय जनवायसयणसंखडणिलए सोमरविमावल्लतियस्कुले पोविज्ञवडाए जलहरपडले इददिघुललियेगधरु ललियंगणामुणकुसमसकानेउहियाण्यासहावाणि यातवणायकति हावणियविहिंघडियाहरजियनरवणियाजितणुतिजावणसिरिजाणी यालयमविसेसेसंपडिळ पायसङणेउरुतदोघडिन इछे सङकैकपमपिजडिलासाससह मण्डुबिपाययड कसूखंडलावप्फुखिमठेसचवसममालचलिया कठेसङ्कसिटमहाराव जियाबळेसईवसमतुविमुखसड़कडियलेणकादिसुनुचखातहोजम्माविलासपमासणीसह जायनाणवसणसणन गयणहिंसद्धणिमिसपेचाप लायमुलपमिक्तिहोतणाबता रोमअडियचामश्णसिरामहमासिय घण्घडिमहकचापडिमद सषिद्ध दिउपयासिताराखडदळणिसानंगनहर पियादहिणियबाङसिर ताईडदिवझिम गहिरसराश्मजातजदापसणतसुरवरिसियाकप्यसरुसुमचरिअमरंगागयुषचिन सरस्खयाकेकोहकदपघरुअबलायराणानरुपायकरुषहहि जिहाजाससरहताव हितारमणविक्करबुझिनसईचहहासवरियासमासुहिणारसमेखि उहिस्साहासणे समिहिनादेवहिंधहिसेठत्तासविदिल मिणुकामकसायविवाजिदलानेणविपरमेसरूयुजि २७ घत्ता-उसके न रोम थे न हड़ियाँ और चमड़ा, न तिल? और न मुंह में मूंछे । घनों से निर्मित कंचनप्रतिमा के समान उसकी देह प्रकाशित थी॥१३॥ वह महाबल मरकर अत्यन्त महान् और अन्धकार को नष्ट करनेवाले मणिमय संपुट निलय में देवकूल में उत्पन्न हुआ मानो मेघपटल में विद्युत्समूह उत्पन्न हुआ हो। वह दिव्य ललितांग देव हुआ, ललित अंग धारण करनेवाला मानो कामदेव हो। वैक्रियक नेत्रों से सुहावना, स्वर्ण की दीप्ति का तिरस्कार करनेवाला। दो घड़ी में ही उसने सुरवनिताओं को रंजित कर दिया, जैसा उसका शरीर था वैसी ही उसकी यौवनश्री उत्पन्न हुई थी। और पुण्य के कारण यह भी हुआ, पैरों के साथ उसके नूपुर भी गढ़ दिये गये, हाथ के साथ मणि विड़ित कंगन और सिर के साथ मुकुट भी प्रकट हो गया। मुकुट के साथ कुसुममाला भी चढ़ गयी और कण्ठ के साथ श्वेत हारावली। वक्ष के साथ पवित्र ब्रह्मसूत्र। और कटित्तल के साथ चंचल कटिसूत्र। इस प्रकार उसके जन्मविलास को प्रकाशित करनेवाले वस्त्र और भूषण साथ-साथ उत्पन्न हुए। उसके नेत्रों के साथ अपलक दर्शन था, मैं उसके लावण्य का क्या वर्णन करूं? शीघ्र ही वह देव अपने बाहुओं और सिर पर दृष्टि डालता हुआ गर्भगृह में बैठ गया। तब गम्भीर स्वर में दुन्दुभि बज उठी। और देवता 'जय-जय' शब्द के साथ दौड़े। कल्पवृक्षों ने कुसुमवृष्टि की, देवांगना समूह ने सरस नृत्य किया। ये कौन हैं, मैं कौन हूँ, यह कौन-सा घर है? वह अपने पैर, हाथ और उर देखता है? सन्तुष्ट होकर बह जैसे ही याद करता है कि उसके मन में अवधिज्ञान फैलने लगता है। उसने जान लिया कि उसने स्वयंबुद्धि के द्वारा प्रेरित संन्यास मनुष्य जन्म में किया था। उसे उठाकर सिंहासन पर स्थापित कर दिया गया, और देवों ने उसका अभिषेक किया। उसने भी काम और कषायों से रहित परमेश्वर जिन की पूजा की। Jain Education International For Private & Personal use only www.jain413.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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