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________________ पविकिपिकारपुणकडा तोकिंवाहहिजयडश्वज्ञाअहोण्यासंतचळकारितामापर्दिसिविणेतरम यामासियतणादियकन्दि किंचवडियसवउविठसादाणउसहुणचढणठहठपवछालपुर दाहपडिवतिकेल सुपिण्यजियामसिमाश सुमतिणजयपसासियाचित्रा शासिवहारएवर सतमतिमंत्रीम हावल राजाप्रति हुनु पक्कअरविंडणामविकाथठ पदमुनुहरिचा वरविंदराजाका इतहा सापकरुबिंडांटसमुजायठार तहिणया दृष्टातकथन रिहियहिकलाणकारि निधरिणिहारकरखल्यहा रिगयगधहकिराडकालय पडिकलपिसणसिय सललय तेतिसिमिसनतिजाम लग्नमंडादन कपिउहताम णिहरहारुमलदारुहपक्वधान पलबसूरवससक जलजलजालन्जलपवन लद्दयावश्कालण्यावश्याणि उजसमणकेमविझगडाझाथिकोग्यरमुद्धवरावारणासातहिया वसरेपंकयवतणेच पिठणाको काविउपदमपुत्व सोसण्ठितणहयरवियराजदिधणश्वणश्वल्लीहा "यदि कोई कारण और कार्य नहीं है, तो जब वज्र गिरता है, तो डरते क्यों हो? यदि जो चीज नहीं है, वह अर्थकारी हो सकती है तो स्वप्न के भीतर सिंह को ले आओ? उससे अहितरूपी गजराज को नष्ट कर दो, हे विद्वानों में श्रेष्ठ, तुम असत्य क्यों कहते हो? न शब्द है, न तुम हो, न मैं हूँ और न वस्तु तो बताओ इष्टप्रवृत्ति कैसे होती हैं। जिनागम में कही गयी बातों को सुनो, जड़जनों के द्वारा भाषित नहीं सुनना चाहिए। घत्ता-तुम्हारे वंश में अरविन्द नाम का विख्यात राजा हुआ है। उसका पहला पुत्र हरिश्चन्द्र था, और दूसरा इन्द्र के समान कुरुविन्द हुआ॥२१॥ शत्रु-गृहिणियों के हार और करवलयों का अपहरण करनेवाली तथा शुभकल्याण करनेवाली गन्ध हाथियों से रहित उस नगरी में, योद्धाओं के लिए कालदूत, प्रतिकूल शत्रुओं के सिर के लिए शूल के समान वे तीनों साथ रहते थे। इतने में पिता के लिए दाहचर उत्पन्न हो गया। हार और चन्दन का लेप उसे जलाता। चन्द्रमा उसे प्रलयसूर्य के समान धकधक करता है । गीला वस्त्र अग्निज्वाला की तरह जलाता है। आपत्ति के समय नींद नहीं आती। उसका अंगदाह किसी भी प्रकार शान्त नहीं होता। वह श्रेष्ठ विद्याधर राजा अपना मुँह कातर ( दीन) करके रह गया। उस अवसर पर पिता ने कमल के समान मुख-नेत्रबाले अपने पहले पुत्र को बुलाया। उसने उससे कहा-"जहाँ सूर्य की किरणों को आहत करनेवाले सघन वन और लताघर हों, Jain Education International For Private & Personal use only www.jain397-org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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