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________________ विवरुसमापवानुजजाजीउसिवपेरणाय तोकिंक्यारंतवतावरणाय कोजाणाकहीदरहाचेही हाहालासगणिहविदाइहकम्माणुवसाजश्मणसिपमा तापलामुणसदरकम माहसरकिंगावर इथवात जडमन्नपिसखदकिंचति णिवहउमडणारजम्मयारिपिउवलयारिजाणिविकमारिजा हसिउतिहवलणविण्डाळिविण्हठिठलेपणहाइहछि विष्णरसंतामणुठकम अणि अण्णाजयसिद्धपम सक्षेछयपकाहापिकले अहमशनहायपत्तनुयल वेत्रासणधाक्षरिमुर ववेचनदहकेयाहिला तहामशिपरिहितिरियलाउगमसंखदाबजलणिहिसमेत पक्कण एकवेहियउतान यल्सयंवरमांजाम चला दिलवर्णमुहिमहलय मंदिरमन.मडियत्ताब हाउपसजग अथलईहायकराणाटणावशारदहवनलायजाहिद्विचत तरिसझखि रसायुमता दटक्वलिसकबाईचिमहाश् चनदारांचनदहणश्मुहाई सयुरिसक्विजिहानिहवि।। साख परिवहिलमाटारयणनाफलिहायकसुममेडरिखसउपचरिदणीलमहालणिकेला जंवतस जंबूदेवठाणु जसुविदिहाधुपियाण जगलहिणवसणविनारजसवरिसमंतिदाचंदर नरका नहसखणमणिलपति अम्टोरियजड़ककिमुपति तहिंदीवमरुपलिमदिसाहासाध्यहिजलकीलिय यासाहिघिका उन्नरतीररममेविनले गालरिहदकिणदिसिमंडेविगंधिलणामेविसाबिद्र घिन्य नरक-विवर-स्वर्ग और अपवर्ग यदि जीव के लिए शिव की प्रेरणा से होते हैं तो फिर की गयी तप को भावना में श्रेष्ठ जग में प्रसिद्ध जम्बूद्वीप है॥३॥ से क्या? कौन जानता है कि शिव की चेष्टा कैसी है, क्या वह इष्ट को नष्ट करनेवाली भीषण होगी? यदि यह कहते हो कि वह कर्म के अनुसार होती है, तो वह स्वजनों का प्रलय में संहार क्यों करता है? शैव उसे उसके ऋद्धि-सम्पन्न दस क्षेत्रभाग हैं (भरत, हैमवत, हरि, रम्यक, हैरण्यवत और ऐरावत, पूर्वविदेह, गोपति (इन्द्रियों का स्वामी ) क्यों कहते हैं? जड़, पिशाच और मत असम्बद्ध ये मुझसे क्या कहते हैं? नर अपरविदेह, कुरु और उत्तरकुरु)। श्रेष्ठ शिखरवाले छह कुलधर पर्वत हैं । दृढ़ वज़ किवाड़ों से जिनके पथ जन्म देनेवाला पिता ब्रह्मचारी है और माता भी कुमारी है। जिस प्रकार शिव, उसी प्रकार ब्रह्मा और विष्णु अंचित (नियंत्रित ) हैं ऐसे चार द्वार और चौदह नदीमुख हैं । वहाँ जम्बूदेव का स्थान जम्बूवृक्ष है जो सत्पुरुष भी नहीं हैं। हस्तिकुल के बिना हाथो नहीं हो सकता। इसी प्रकार बिना मनुष्य परम्परा के मनुष्य कैसे? के चित्त की तरह विशाल है, जिसकी मरकत रत्नों की शाखाएँ फैली हुई हैं. जो स्फटिकमय कुसुम मंजरियों इसप्रकार जग अनादि निधन सिद्ध हो गया।'" सात, एक, पाँच और एक रज्जू विस्तारवाले क्रमश: अधोलोक, से शोभित है और प्रवर इन्द्रनील मणियों के फलों का घर है, जिसके निर्माण संस्थान को निश्चित रूप से मध्यलोक, ऊर्ध्वलोक (ब्रह्म ब्रह्मोत्तर स्वर्ग तक) और उसके आगे के लोक का भूतल है। अधोलोक वेत्रासन देवों द्वारा देखा गया है। उसके ऊपर दो चन्द्र-सूर्य घूमते हैं, जो मानो निश्चित रूप से विश्वरूपी लक्ष्मी के के समान, मध्यलोक झल्लरी और ऊर्ध्वलोक मृदंग के समान, कुल चौदह रज्जू प्रमाण ऊँचा है। उसके मध्य भूषणविकार हैं। नक्षत्रों की संख्या मुनि नहीं बताते, तो फिर हम जैसे जड़कवि उसका क्या विचार कर सकते में तियच लोक बसा हुआ है, जो असंख्य द्वीपों और समुद्रों से सहित है। एक ने एक को वहाँ तक घेर रखा हैं? उस द्वीप के सुमेरु पर्वत की पश्चिम दिशा में सीतोदधि है जिसमें मत्स्य जल-क्रीड़ा करते हैं। कि जहाँ तक स्वयाभूरमण समुद्र है। घत्ता-उसके रम्य और विशाल दक्षिण तटपर, नीलगिरि की उत्तर दिशा को अलंकृत कर गंधेलु नाम घत्ता-उसमें लवण समुद्र की मेखला से घिरा हुआ और मन्दराचल के मुकुट से शोभिन सब द्वीपों का विषयविड है। Jain Education International For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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