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________________ तोलदरकेछु णावोहाणविक्छ। किंगयणेक्षाध्यकयपवित्तिदाबामदावपळालश्वनिधम्मत कामनतिजासाकहिलळापसस्ताव णिकरियहोकहिं किरियासिसु णिवस्तुसही होणहरिसरास विणतिहातणमफलतिकिहकरणहरणवहानहाति विकिसावटकाहि सिबलमार्किकतारवाहि घना कसहोसियसयस करखतमङमणलावश सिन्अष्णाज शुभप्पडने करविकाध्यणवंतहसावधाविण्घट्याणरएणसमुठलश मिर्पिटनसश्सकलए सहाइ तापककमुकतारुलणमिणतासासायविलियुगामि जसरुसुवण्यलहाणिमित्र तो तासकवणुतगुणविचित्र जमणिचुणतोयरिणामरिद्धि पियरिणामहाकहिकम्मसिद्धि विराप्पिाला मालवणकासनकाहादीसमकालतास जसमलाबमसणिकिरियकरसंघारसमयससरीरध। रुपुष्यामृतार्हसतोयमाण पावणणालिप्पकिप्रथाजशलपणानइरिगणसिद्ध तोविच यसिरखचणअसहजत्यसणहासिलसिसचंड ताणानहाइकिहमखेडू महाहवरिवहरूहि खाणणचवमार्कसंतहाविहाण परियापिनहोतउजश्दा तादापणिम्मियकाश्तण अश्वनले पनिकिलरला तोकिप्पकिमानसहाविहाठाघना। निणणाहणविदिहामिछाविसविद्यारण संदशंकिवणियकुवाश्यहि सिवगयणारविंदमदरहशा माणुणयाणसांजेमतु णिवणर वह स्रष्टा उन्हें कहाँ पाता है? निराकार से क्या कोई वस्तु हो सकती है? क्या आकाश में कमलों की रचना के कमसिद्धि कैसे हो सकती है? भुवनकोष की रचना कर यदि वह उसे नष्ट कर देता है, यदि उसकी ऐसी हो सकती है। दीपक से दीपक में बाती जलती है? परन्तु जिसमें धर्म, अर्थ और काम नहीं है, उसमें इच्छा क्रीड़ा है, यदि वह समस्त जग और जीवों को निष्क्रिय होकर भी बनाता है, और संहार के समय अपने शरीर का प्रसार कैसे हो सकता है? निष्क्रिय में क्रिया विशेष कैसे हो सकती है? जो निष्पाप है, उसमें हर्ष और में धारण कर लेता है, उनके बन्धन का संयोग करता हुआ वह पाप से लिप्स नहीं होता? तो क्या वह अज्ञानी क्रोध नहीं हो सकता। तृष्णारूपी तंत्र के बिना फल नहीं हो सकते। उसके बिना ( करना हरना) आदि बुद्धियाँ है? यदि वह सिद्ध है और पाप से लिप्त नहीं होता तो फिर ब्राह्मण का शिर काटने से वह अशुद्ध क्यों है? नहीं हो सकतीं। क्या बिना छत्र के छाया आ सकती है? शिव को कर्ता की व्याधि किस प्रकार लग गयो? यदि यह कहते हो कि शिव नहीं शिव का अंश चण्ड होता है, तो क्या हेमखण्ड नाग हो सकता है? (बह पत्ता-बड़े से भिन्न कुम्भकार घड़े को बनाता है, यह बात मुझे जंचती है। शिव अपने से विश्व की कहलायेगी शिवकला ही) नगरदाह, शत्रुवध, रक्तपान और नृत्य करना क्या यह सन्तों का विधान है? यदि रचना करता है, फिर गुणवानों को शाप क्यों देता है?॥१॥ शिव के द्वारा परित्राण किया जाता है, तो उसने फिर दानवों की रचना क्यों की? यदि उसने बत्सलभाव से लोक की रचना की तो उसने सबके लिए विशिष्ट भोग क्यों नहीं बनाये? घत्ता-जिससे मिथ्यात्वरूपी विष की बूंदें झरती हैं, कुवादियों के ऐसे शिवरूपी आकाश-कमल के घड़ा यदि बिना कुम्भकार के स्वरूप ग्रहण कर लेता है, और मिट्टी का पिण्ड स्वयं कलश हो जाता मकरन्दों को जिन भगवान् ने नहीं देखा है, उनका क्या वर्णन किया जाये ! ॥२॥ है, तो मैं कर्ता और कर्म को एक कहता हूँ और नहीं तो भेद से दोनों को भिन्न मानता हूँ । यदि ईश्वर भुवनतल का निमित्त है तो उसका कर्ता कौन है ? यदि वह नित्य है तो उसमें परिणामवृद्धि नहीं हो सकती । परिणामरहित अज्ञानी स्वयं अपना मार्ग नहीं जानता, Jain Education Internation For Private & Personal use only www.jan379..
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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