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________________ युकदमयजलवणठे झायनकरिहिंकटकंडयणवर्णगुहयणकेणिहिजारसरहलवण्यरण रहापरिजदेदिचडतिजामुसुरघरिणिडि उरियलटागहतरतरणिहितकताण्जासहम छाया हसविहरियादमसजाया जासुस्वकदासवड यायमूदारघाणघशायना अासपर जासमणीसरहा नवपहावउवसंत करिकसरिपाउलकणिशंसहदितिरमनज्ञानयवदि हिपहपउनुसपतिए तासलरङगठवंदणलए निए शुणणरहिमपटापटियखळ पसुय विजोकोविपलबउ पच्कामेश्रकामुपार! इन परायगनकमनिह पश्यालया। सरथचकवत्रि लगजोध्य पश्यपरणविपरमझ्दोश्याचा वडवलिपति बदनाकरण। पियवलेणहजोकिंठ पजियापति कारूसंरकिम घमडदिखापहश्सहों उड़ा परमेसरजगेपरम पलवयारधारावसाम य दिमुविषियमेशवसता पञ्जहाजगगुरुणाजहा एकुदापिजतिडयणतेहा हिरसणसणार उनका शरीर हाथियों की मदजलों से स्नान करनेवाली सँडों के खजाने का साधन हो गया। उनके चरणों के अंगूठों के नख पर तीरफलक रखे जाते हैं और वनचर मनुष्यों द्वारा पैने किये जाते हैं। सुरबालाएँ और नभचर तरुणियाँ उनकी देह पर चढ़ जाती हैं और लताओं को तोड़ती हैं। उनकी शरीर की कान्ति से निष्प्रभ होकर हंस भी हर रंग के हो गये हैं। उसकी रक्त कन्द के समान एड़ी है जिससे सूअर ( जंगल के पशु- पक्षी) अपनी नाक रगड़ता है। घना-उसी मुनीश्वर के तप के प्रभाव से शान्त पास बैठे हुए सिंह और गज, नागकुल और नकल साथ-साथ रमण करते हैं और घूमते हैं।॥८॥ एक दिन भरत अपनी पत्नी के साथ उन बाहुबलि की वन्दना- भक्ति के लिए गया। पैरों में पड़कर राजा उसकी स्तुति करता है-"आपको छोड़कर जग में दूसरा अच्छा नहीं है, आपने कामदेव होकर भी अकामसाधना प्रारम्भ की है। स्वयं राजा होकर भी अराग (विराग) से स्नेह किया है, बालक होते हुए भी आपने पण्डितों को गति को देख लिया है। अपर (जो पर न हो) होते हुए भी आपने पर ( अरहन्त ) में अपनी मति लगायी है। तुमने अपने बाहुबल से मुझं माप लिया है। और तुम्हीं ने फिर करुणाभाव से मेरी रक्षा की है। तुमने अपने हाथ से मुझे धरती दी है, वास्तव में तुम्हों जग में परमेश्वर हो। दूसरों का उपकार करने में धीर और शान्त। जो धरती का परित्याग कर अपने नियम में स्थित हो गये। तुम्हारे जैसे और विश्वगुरु ऋषभनाथ-जैसे मनुष्य इस दुनिया में एक या दो होते हैं। लेकिन हम जैसे रसना और स्पर्श Jain Education International For Private & Personal use only www.jains59.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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