SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 369
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ किरदयणगापलारण जीवंतहसलिले दोश्यण यादिदेदिखअनसुतऋजुजेण्यतोश्तेवता सावनिकलजेलसदिधपवागमहाराकारहमादजाणविदवानरकलापहि पिवविद्धा नविनवणार महिलाणगोहढन्सयपमरन गोहापागादकाइदाखग्नायताजसपणतएमा मियम तोकिमनहिपृहसडारा पियक्षणकणमटरकयविवसापछिवसयलढतिविवरणारयात सरवाइवलि सियर्सगासायरलग्न गरिहसिगमणिधहपयरत कुलोणक अनिडाइकरगी कारणमाणमहल पहाणमदावलाविषिविमल्ल सुकंचणक उलमंडियगड पसारिखवादासपोड चिरउसचंदचडादि समाम सुविकमवतणराहिवकाम समकसिरीणरणणिय किदा महारदवारहसकरतेय असकखगकमसंकधिपका जयसुपसादियवृष्णयसका मिलतिमिलप्पिणुहळेधरति छ। रिप्पिणदेवघडणपर्डति पंडतितिगादानवधादेतिकडाय लकंठनिस्तविठति निरुद्धविवाहवलण्मयतिमुपप्पिण उडेवितिवलति अलग्रजाविहाणसवाशेमचंगणकहणदढपायाशंकरंतिविधीस्थविवि NDIA मेरा मुख देखने से क्या, जीवितों को पानी देने से क्या? ओ आओ और मुझे इस तरह बाहुयुद्ध दो जिससे ही कुलीन और मान में महान् पृथ्वी के कारण (लड़ गये)। दोनों ही प्रधान और महाबल-मल्ल। दोनों ही दोनों का अन्तर स्पष्ट हो जाये।" तब जिनपुत्र बाहुबलि बोला-"तुम व्यर्थ बोलते हो, मेरे धनुष-बाण का संकुचित कुण्डलों से अलंकृत कपोल, दोनों ही क्रुद्ध और प्रचण्ड अपने बाहु फैलाये हुए, चिरायु, चन्द्रमा उपहास क्यों करते हो, हे देव, जानते हुए भी तुम व्यर्थ बोलते हो, प्रियविरह से उद्विग्न के समान तुम क्यों के समान प्रसिद्ध नाम, विक्रम से युक्त नराधिप की कामनावाले और समर्थ, लक्ष्मी और रति के आश्रय, नहीं रोते? महिलाओं का साथी मैं स्वजनमार्ग (शयनमार्ग) में हूँ, लेकिन तलवार निकल आनेपर मैं योद्धाओं महारथी आभा से युक्त और सूर्य की तरह तेजस्वी। शंकारहित गरुड़ और मत्स्य के चिह्नवाले, पंक से रहित, का योद्धा हूँ। और यश की किरणों से पुण्यरूपी चन्द्रमा को प्रसाधित करनेवाले थे। वे दोनों मिलते हैं, मिलकर हाथ पकड़ते ___घत्ता-यदि तुम स्वजनत्व मानते हो तो हे आदरणीय, धरती क्यों माँगते हो? हे राजन्, अपने धनकों । हैं। हाथ पकड़कर देह से लगकर गिरते हैं । गिरते हुए मजबूत पकड़ करते हैं और कमर और गले को रुद्ध के मद से विवश किये गये सभी लोग विपरीत हो उठते हैं" ॥१४॥ कर रह जाते हैं। विरुद्ध भी पकड़ को बल से छुड़ा लेते हैं. छूटकर उठकर शीघ्र मुड़ते हैं, और समर्थ बाहुयुद्ध १५ के सैकड़ों विधान (दाँव-पेच) जैसे चाँपना, काढ़ना, बेठन (लिपटना) आदि करते हैं। दोनों ही धीर और उस समय महेन्द्र शिरोमणि दोनों भाई अपने पैरों के अग्रभाग को रगड़ते हुए बाहुयुद्ध करने लगे। दोनों अस्खलित अंगवाले Jain Education International For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy