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________________ लाडलंसार सिल्ली एमुक्छयायाचलाकलकलासयाणमपरकेतपरिवंदसहाणिमनहळिदयोंडार विमहाशवाभिरितिमिनिजाउंटरिय पडणाधिनसलजाललायह वियर उमारमहलहाएम हाशिवछछलपावधिविदलिय दहामहरखळमेरिबधुलिया कारिरला धावता य तारावलिमदरासाणीमरानमारदरचदकति गणालमहाहहहयपात व तादासारर्कठसहकठियसताराणसरसरिधवलतरंगफार गयणुल्ललतारसरमा राइसकिएलरहहादिमुक्त पदाक्षगांधरुजलवालकापलाञ्चदिसुताएराधवलाजिर किक्षिाकणयविसरयाबाबलाए गनुययविहरिससहररुय सलिलणवहान हरियावरियाययणइंतरिमाइं उग्यासिडविजमहासरहिं वाकबलिरहिवकिकरदि घा सीमधुणवमुणवळख सरवरखारिपवामितउ पडिसरियलपहचशगाश्करडकारद जितना जलसरियसनासावंसपण वहियपडिलडवलसंसयण तहिलमडलियरंगण पा रिडळेसरतारंगण रासारुणचिरंजिदिसण सप्पणविश्वासाविसण सादगावंडडुवकसरण मिनिसारसरण पालिकाश्तेरठउन चाट रसुपिजश्वजश्रावससानाबसविकसक्षम साहापजहाकहिलन्नतिजाद अवियाणियखतिव्यधासारामहिलाणतोहहोमोरियाका ११५ कोलाहल हो रहा था, जो सारसों से भरा हुआ था, सूर्य से मुक्त किरणावली से फूल खिले हुए थे, जिसमें ने महास्वरों में विजय की घोषणा कर दी। अनेक पक्षीन्द्रों और यक्षेन्द्रों को शब्द सुनाई दे रहा था और जो डूबते हुए गजों की सैंडों से मर्दित था। बत्ता-अपना सिर पीटता और छल छोड़ता हुआ तथा सरोवर के जलप्रवाह से अभिसिंचित पृथ्वीपति घत्ता-ऐसे उस सरोवर में वे दोनों उतरे। स्वामी ने अपने भाई के ऊपर जल की धारा छोड़ी मानो भरत हटाया गया। पृथ्वीपति भरत उसी प्रकार जीत लिया गया जिस प्रकार हाथी से हाथी जीत लिया जाता हिमालय से गंगानदी धरती के ऊपर आ रही हो ॥१२॥ है।॥१३॥ १३ वक्षस्थल पाकर वह फिर मुड़ी और दुष्ट की मित्रता की तरह नीचा मुख कर गिर पड़ी। उस सुन्दर के जिसकी नाक की नली जल से भर गयी है, जिसे प्रतियोद्धा के बल में संशय बढ़ गया है, जिसने कटि तट पर दौड़ती हुई ऐसी मालूम हो रही ती, जैसे मन्दराचल पर तारावली हो। मानो मरकत महीधर पर माण्डलीक राजारूपी भी हरिणों को छोड़ दिया है, ऐसे नरेश्वर भरत ने वेग से तीर पर जाकर क्रोध से लाल चन्द्रमा की कान्ति हो, मानो नील वृक्ष पर हंस पंक्ति हो, हिलती हुई धारा ऐसी मालूम होती थी, मानो कण्ठ आँखों से दिशा को रंजित करते हुए अत्यन्त विषदाढ़वाले सर्प के समान अथवा अयाल उठाये हुए सिंह के से भ्रष्ट स्वच्छ हार हो, मानो चंचल लहरों से विस्फारित गंगानदी हो, कि जिसमें आकाश तक मत्स्य और समान भाई की भर्त्सना की-"जो अपने ईख के धनुष को पीड़ित कर उसका रस पीता है, और सुस्वादु शिंशुमार उछल रहे थे। तब क्रुद्ध होकर सुनन्दा के पुत्र बाहुबलि ने भरत के ऊपर भारी जलधारा छोड़ी। गुड़ खाता है और जिसके पुष्परूपी तीर भी चोटी की शोभा करनेवाले हैं ऐसा तुम्हारे जैसा योद्धा कहाँ पाया उसने राजा को चारों ओर से आच्छादित कर लिया, मानो जिनेन्द्र भगवान् की कीर्ति ने तीनों लोकों को ढक जा सकता है? क्षत्रियों के श्रेष्ठ धर्म को नहीं जाननेवाले, महिलाओं और अपने ग्रामप्रमुख का अहंकार लिया हो, मानो शरद् की मेघावली ने स्वर्णगिरि को, मानो चन्द्रमा की किरणमाला ने उदयाचल को ढक रखनेवाले तुम्हें लिया हो । जल से नवस्रोत पूरे हो गये, बहु परिजन और स्वजन पीड़ित हो उठे। तब बाहुबलि राजा के अनुचरों For Private & Personal use only www.jain349g Jain Education International
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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