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________________ हंधम्मगुझियह मम्मवियारणवसणहं कोचा महसम्मुदयाशणाकोमहिघश्यरपिसणहान धारणाली अहवातहिहिये अंसमागयाइलहणरन जोविसयविससे शिवपावसातमा किंबहताना कंचगवउविध मोतियदाममकरवशाखालटकारपोदउलुमाउरखवाय मिनुस्लिमपिफोडकपण्यररुकपिरिश्कोवानहावयारला तिलखलुपयाडहिविचरण दातरू वियुगासप्पड़ाययश्करू पायईकसलाहियसक्का तविविवसामाणिकम्जो मण्मत्रपत्लागासणसमापदीयुकासासचिवसमतगणयपियनरतुकलठविल संचितश्मरशसणसणरसहन मममकरंजिहमेंढकश्यलयकालसहूल उसडरक यासपजाले मजरजस्मसिनमडलजाउमडुमाइडलाघता केलासहोजाए। वितवचरण ताण्तासिठकिनाजेपदसहसहताव्यरि समागिपनिसकिनाशाारणाली ज्यलरिक्रमारया मारमाया समरमापवमा दारावयारयवरायसवरादयकाणणपत्र मानादिहतार्दिकलासिजिपसरुसंधाउरिसदपाडपरमसकनवरिसिणाइवसहरसहय अयति । यमिंदमलिलालियपथ जयजाणियपरमरकरकारण जयजिणमादमहातरूवारण जनसहवास डासावारणा जयससहरसियचारिपवारण मुणविपचपरमहिणवायण पंचमुहिसिरिलाग रय धर्मरूपी गुण से रहित/डोरी से रहित, वम्म (मर्म/कवच) के विदारण के स्वभाववाले बाणों के सम्मुख रण सिंह के द्वारा खाया जाता है, दुःखरूपी आग की ज्वाला से जला दिया जाता है। यह जीव मार्जार, कुंजर, में और दुष्टों के सम्मुख राजा के घर में कौन खड़ा रह सकता है?॥८॥ महिष, कुक्कुर, बन्दर और सर्प विशेष उत्पन्न होता है। घत्ता-पिता के द्वारा कहे गये तप को कैलास पर्वत पर जाकर करना चाहिए, जिसके कारण अत्यन्त अथवा उनसे क्या, जिन्होंने प्राप्त दुर्लभ मनुष्यत्व को नष्ट कर दिया। और जो उसे परवश होकर नष्ट करता सन्तापकारी संसार के प्रति तृष्णा क्षीण होती है ॥९॥ है, उसका क्या पाण्डित्य? वह स्वर्ण के तीर से सियार को बेधता है, मोती की माला से बन्दर को बाँधता १० है, कील के लिए देवकुल को तोड़ता है, सूत्र के लिए दीस मणि को फोड़ता है, कपूर और अगुरु वृक्ष को यह कहकर काम को मारनेवाले उपशमरूपी लक्ष्मी के धारक और प्रसन्नकुमार, जिसकी गुहाओं में वराह नष्ट करता है और (उनसे) कोदों के खेत की बागर बनाता है । चन्दन वृक्ष को जलाकर तिल-खलों की रक्षा विचरण करते हैं और जो शवरों की शोभा से युक्त है ऐसे वन में चले गये। उन्होंने कैलास पर्वत पर जिनेश्वर करता है। साँप को हाथ में लेकर उससे विष ग्रहण करता है। पीले, काले, लाल और सफेद माणिक्यों को के दर्शन किये और परमेश्वर ऋषभ की स्तुति की- "हे वृषभ वृषभध्वज, आपकी जय हो । देवों के मुकुटों से छाछ में बेचता है, जो मनुष्यत्व को भोग में नष्ट करता है उसके समान हीन व्यक्ति कौन कहा जाता है ! जो ललितचरण आपकी जय हो। परम अक्षवपद के कारणस्वरूप आपकी जय हो। मोहरूपी महावृक्ष का निवारण अपने चित्त को समता में नियोजित नहीं करता, पुत्र-कलत्र और धन की चिन्ता करता है, रसना और स्पर्श करनेवाले हे जिन, आपकी जय हो। सुख में वास करनेवाले, दुराशा का निवारण करनेवाले आपकी जय हो। चन्द्रमा रस में दग्ध होकर उसी प्रकार मर जाता है जिस प्रकार मे-मे-मे करता हुआ मेंढक मरता है। प्रलयकालरूपी के समान श्वेत छत्रवाले आपकी जय हो।" फिर पाँच परमेष्ठियों को नमस्कार कर, पाँच मुट्ठी केशलोंच Jain Education International For Private & Personal use only www.jan319org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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