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________________ पियसाधणनदेविकमणागावलेणणराज श्वसमापुडाकिंगणेमाणुसमेत शासर वजलकालियसारस दरिसाविनवण्यसारसय कापणपरिहिंटिदाजरयं गयणेगणवि गणिकंजरस फललाराणयसरतसविडवारश्यरणिलपहिखमरविडवं उसहि सारियाद सहरलावणसरहिसमाहिमविसहरयासिंगग्नवतधुवावसहरले सईसेविदाविसहरसहज सहश्चकिजसर्विसहरयो मोनूतममलधरणिहरसवटासमपरधरणिहर चलिदासहपर डणापरदन सारहिकरकसवाश्यर यहिभाणवणासकमपुछद्दिसत्ताएसंकम इंहिमवततलेणजिविक्कम दिनहेर्दिनुवमुदकमर्श गागदहरिकरिमसियल अवठं सेविसंसेविमहिसयल णिसवाहेणिहालेविचंदवल मंदाणिपलिण्यपियवलुजगससि यअसिक्षासियदि मर्दिणिववक्षरा सिमादीचना दासश्पट हिमवंतसिहरिसिंग मन सरहहोतण जसविलसिउसनेविलम्नानाससियणमय परिसमियमए उववण गहिरघणविवरहरे खगणिदरहर सुरसरिसिहर शिवससणिणी अमरखरमणाचलहार मणाजणमणदमणी छपाससिवमा अवलयणटाणा वरादरगमणा मजिणण्हवणा घत्ता-रूप, विक्रम, गोत्र, बल और न्याय युक्ति में तुम तुम्हारे समान हो दूसरे मनुष्य मात्र से भूमि का आश्रय लेकर और रौंधकर सैन्य अपने स्वामी का चन्द्रबल देखकर मन्दाकिनी नदी के किनारे ठहर क्या? ॥ ७॥ गया। विश्व में प्रसिद्ध तलवारों की धाराओं के समान निर्मल राजा की छावनियों में स्थित अनुगामी सैनिकों सेजिसमें (पर्वत में) सारस सरोवरों में क्रीड़ा कर रहे हैं, चम्पक वृक्षों की लक्ष्मी दिखाई दे रही है, कानन घत्ता-हिमवन्त पहाड़ के शिखर का सफेद अग्रभाग ऐसा दिखाई देता है मानो भरत का स्वर्ग में लगा में गज परिभ्रमण कर रहे हैं, कुंजों का पराग आकाश के आँगन में छा गया है, कल्पवृक्ष फलों के भार से हुआ यशविलास हो॥८॥ नत हो गये हैं, सुखकर लतागृहों में विद्याधर विट हैं, औषधियों से नाग हटा दिये गये हैं, वन सुरभियाँ (गायें) वृषभरति को चाह रही हैं, ऐसे उस स्वच्छ पर्वत को छोड़कर, ध्वजसहित दूसरों की धरती छीननेवाली, प्रचुर जो चन्द्रकान्त मणियों से युक्त है, जिसमें पशु विचरण करते हैं, जो उपवनों से गम्भीर है, जिसमें बादलों अश्वोंवाली और सारथियों के द्वारा हाँके गये रथों से युक्त सेना अपने प्रभु के साथ चली। अभिमानी और से रहित घर हैं, जो पक्षि-कुल को धारण करती है, ऐसी गंगा के शिखर पर गुणी इन्द्राणी निवास करती नि:शंक मति वह पूर्व दिशा की ओर प्रस्थान करता है। वह हिमवन्त के तलभाग से जाता है। और जाते हुए है। चंचल हारमणिवाली जो लोगों के मन का दमन करनेवाली है। पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान मुखवाली कुछ ही दिनों में धरती का अतिक्रमण कर जाता है। जिसमें गौ, गर्दभ, गज और महिषदल हैं, ऐसी समस्त जो कमलनयनी है। उत्तम गज के समान चलनेवाली. जिनेन्द्र भगवान का अभिषेक करनेवाली For Private & Personal use only www.jainelibrary.org Jain Education Intematon
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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