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________________ अश्वारितारणुचितिजशतारावलनमजोठ तेणविसापुमतिविनश्चमान गियर मणचिंतियठतखधात्रयम तंचम्पस्यापजगलरधरू माखिपुथविन जगगनराधनाधवलाल वचजियससहरू वशे बारहजाटणाविळार सिविरुक्कलारमाणिणापविनलकन्नचम्मक टासउडमिनधरिसतयाणियान गयणयलधरणियलागिरिसिद रिलियम पडिएणपतरणतो पणपल्लियन अश्णादावनहिरासमुग्नेमि णिवसतिणखणाराणाश्सग्नमितिदागवरिपति तपरजापति हामिहाश्सारकाध्माणति रमादरसाहण्जामसचरशअरविदामिअलि मलुबरहकरश्खलबलदरवायाहियमिासंसह कागणिकयापचससिमरहिवासत्रास रखेगणवरहहि तूडामणिोहिमारपमिलुहाहा गालहरिणालकालिटिकालहिं मुह कहराणिमाकगरलगिजालहि मगतलंगसंगरिटासालदिसिसससिहरायारदादाकराल दिणिहवियपरदडजमडदाहहिं यात्रघोलतच जमलजाहहिं गात्राहिमाणहिपरि गहिदामढहिं कलाहिडोवरासारुणहि पासासविसलवमलालिनदेहहिं महमरुतगति हिंगरगामिसंडेहिं हरिकरिमहाजाहसामतपत्रारुविनण्यरुतिनपावठियमुखधाहरामा १३८ तब राजा ने सेनापति का मुख देखा, वह भी शीघ्र आदेश समझ गया। चलती है और जो कमलों के गर्भ में भ्रमरकुल की तरह रति करती है। वह शत्रु की शक्ति के हरण का उपाय घत्ता-अपने मन में विचारकर, जनों के भार को धारण करनेवाले चर्मरत्न को उसने तलभाग में डाल अपने मन में सोचता है और कागणी के द्वारा निर्मित सूर्य और चन्द्र की किरणों का प्रयोग करता है । सात दिया। और ऊपर जग के गौरव, चन्द्रमा को जीतनेवाले धवल आतपत्र स्थापित कर दिया॥१०॥ दिन-रात बीत जाने पर चूड़ामणि धारण करनेवाले मारने के लिए विरुद्ध, कोयला-हरि-नील-कालिन्दी और काल के समान काले, मुँहरूपी कुहर से विषाग्नि चालाओं को ऊँचे भ्रूभंगों से भंगुरित (टेढ़े) भालवाले शिशु चन्द्रमा के आकार की दाढ़ों से विकराल, दूसरों के दण्ड को नष्ट करनेवाले यमदण्ड के समान दीर्घ, मत्स्यों के द्वारा मान्य पानी में वह शिविर बारह योजन तक विस्तृत विशाल छत्र और चर्म निमित्त सम्पुट आरक्त चंचल लपलपाती दो जीभोंवाले, भारी अभिमानवाले, म्लेच्छों का परिग्रहण (आश्रय) लेनेवाले, में वर्षाकाल के समय स्थित हो गया। गिरते हुए प्रचुर पानी के दबाव से आकाशतल, धरणीतल और गिरिशिखर कलह के इच्छुक दुर्दर्शनीय और क्रोध से आरकत नेत्रोंवाले, निश्वासों के विषकणों के भाल से चन्द्रमा को जलमय हो गये। लेकिन चर्मरत्न और आतपत्रों के सम्पुट में राजा के लोग इस प्रकार रह रहे थे, मानो स्वर्ग आलित करनेवाले, मारो-मारो कहते हुए साँपों के द्वारा, अश्वगजों, महायोद्धाओं और सामन्तों के प्रभारवाल में स्थित हों। मेघ बरसते हैं, वे यह नहीं जानते। वे इष्ट और मीठे सुखों को मानते हैं । रत्नों के भीतर सेना स्कन्धावार दुहरा-तिहरा घेर लिया गया। wwww.ja275ry.org For Private & Personal use only Jain Education Internation
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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