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________________ सत्यचक्रवर्त्ति मेघारु सेनाप तिष्टक्का करण तरथचक्रवर्त्ति सिंघासनवइवे २ हा सेमाही नहंमूला जलहिजस समुझाडिंडीरक्ता व लंडेक्रितीच्च मयस्सम्यचदर्विवफलता युबती तार है जयइणवल्यानुशल रहेस किन्नकृतको वरतणुमनमहेण जिंसभागहे‍ Jain Education International यन।। टापहा रमहि पाव दिपुल कपडा सिइति B455 सन्धि १४ जिसने मगधराज को जीता है और अपने भुजबल से प्रभास को दलित किया है, ऐसे वरतनु के मद को चूर करनेवाले भरतेश ने परम शत्रु-राजाओं को नष्ट करनेवाले सेनापति को आदेश दिया। लुनिलि से हय्या श्हा सा हायायसु रहेस ताप सिमणि सेहरु सजणसविल विडला सोपलाश्पणविय सिप्स हसि मुहससिकिरणपसा रिधवलियदि एव घणच्चु पिस मडरमण हर गिरु सुनुयण सरधरुणिरुवमुणिरु सोकस जामत निवसश खंडमडा, चामया For Private & Personal Use Only नरथचक्रवच कामश्मन समरुद्धिन नतीकरणं ॥ ३ १३० १ दुवई - तीन खण्ड धरती को जीतनेवाला राजा जब अपने शिविर के साथ निवास कर रहा था तभी कानों में कुण्डल पहने हुए मणिशेखर नाम का देव वहाँ आया। अपने मुखरूपी चन्द्रमा की किरणों से दिशाओं को धवलित करनेवाला वह प्रणामपूर्वक बोला "नवमेघ के समान गूँजती हुई मधुर और सुन्दर वाणीवाले तथा भुवन का भार उठानेवाले हे अत्यन्त अद्वितीय सज्जन, 259y.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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