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________________ उपसम्माणशायाजोविहिणाणिमिमकबपिंड तणिसणेविसोसंचलिलखंडाबादचदिहसरहणक म धाश्सरिसरिकल्लोलुतमासुपुतासुतणविष्लपदाण घस्थायोग्रॉगयविदा संलास पियवयणहिरवा निम्मुक्काईसुर्णपरमधमा घयायउरणमणिपिदाणु सुङधामणय कबहासापुणुगणसणेप्पिणमपहराई पहाणरणक्षणसुददारावरहाणबिलवण सणाशदिनदेवंगनिवसणारंथाबसरसालमायणाईगलियाजामकश्चम दिमाशंदेवासगणकश्तपिठेतामा सम्प यंतससिलिहियखामणियसिरिधिसस विशिमसद्धि गिरिधारुवारसश्वसरिडा पश्ममिठधामठेचीरराज उपमजामिन साउापचितासुजश्करहिंज्ञानाघडवप लायकडा उडदेउकाविसवणवधुसुरण्वय रिपसारसबंध यसमिसिददेहितमा निधिलकनिधदज्जमाघबाललियालाणूसा लकारए वायएताकिंकिबाजश्वयुमसरविया अहहरडारउसझावनथुणिनाशाचासिय दसर्पविधवलोक्यासु ताजंपश्वरखायाविलास सोदेवापदणजयसिराहाकिंदिजस्कटमुरि ४ करते हो तो तुम्हारा परलोक-कार्य सध सकता है। तुम भव्यजनों के लिए बन्धुस्वरूप कोई देव हो। तुमसे जिसे विधाता ने काव्य-शरीर बनाया है, ऐसा खण्डकवि पुष्पदन्त यह सुनकर चला। आते हुए भरत ने अभ्यर्थना की जाती है (मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ) कि तुम पुरुदेव (आदिनाथ) के चरितरूपी भार को इस उसे इस प्रकार देखा जैसे सरस्वतीरूपी नदी की लहर हो। फिर उसने घर आये हुए उस (पुष्पदन्त) का प्रमुख प्रकार कंधा दो जिससे वह बिना किसी विघ्न के समाप्त हो जाये। अतिथि-सत्कार विधान किया तथा प्रिय शब्दों में सुन्दर सम्भाषण किया-"तुम मानो दम्भ से रहित परमधर्म पत्ता-उस वाणी से क्या? अत्यन्त सुन्दर गम्भीर और अलंकारों से युक्त होने पर भी जिससे, कामदेव हो, तुम आये अर्थात् गुणरूपी मणियों का समूह आ गया, तुम आ गये अर्थात् कमलों के लिए सूर्य आ गया। का नाश करनेवाले आदरणीय अर्हत् की सद्भाव के साथ स्तुति नहीं की जाती॥६॥ " इस प्रकार पथ से थके और दुर्बल शरीर के लिए शुभकर सुन्दर वचन कहकर उसने (भरत ने) उन्हें उत्तम स्नान, विलेपन, भूषण, देवांग वस्त्र तथा अत्यन्त स्वादिष्ट भोजन दिया। जब कुछ दिन बीत गये, तो देवीसुत (भरत) ने कहा-'चन्द्रमा के समान प्रसिद्ध नाम हे पुष्पदन्त, अपनी लक्ष्मी विशेष से देवेन्द्र को जिसने जीता तब, अपनी सफेद दन्त-पंक्ति से दिशाओं को धवलित करनेवाला और वरवाणी से विलास करनेवाला है, ऐसा गिरि की तरह धीर और वीर भैरवराजा है। तुमने उस वीर राजा को माना है और उसका वर्णन किया पुष्पदन्त कवि कहता है-"विजयरूपी लक्ष्मी की इच्छा रखनेवाले पुरुषसिंह देवीनन्दन (भरत) काव्य की है ( उस पर किसी काव्य की रचना की है। इससे जो मिथ्यात्व उत्पन्न हुआ है यदि तुम आज उसका प्रायश्चित्त रचना क्यों की जाये? Jain Education International For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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